काराकास/नई दिल्ली। घड़ी में सुबह के करीब छह बज रहे थे। लोग अपने रोजमर्रा के कामों की तैयारी कर रहे थे। कहीं बच्चे स्कूल जाने के लिए तैयार हो रहे थे, तो कहीं दुकानों के शटर खुलने वाले थे। लेकिन अगले एक मिनट में सब कुछ बदल गया।
धरती ने पहले हल्का कंपन किया। लोगों ने इसे सामान्य झटका समझा। कुछ सेकंड बाद जमीन इतनी तेज हिली कि बहुमंजिला इमारतें झूलने लगीं। सड़कें फट गईं, पुलों में दरारें पड़ गईं और देखते ही देखते पूरा इलाका धूल के विशाल गुबार में बदल गया। चीखें, सायरन और मलबे में दबे लोगों की मदद की पुकार—Venezuela के कई शहरों में यही सबसे पहली आवाज थी, जिसने भूकंप के बाद की सुबह को भयावह बना दिया। taazanews24x7.com
कुछ ही मिनटों में यह साफ हो गया कि देश हाल के वर्षों की सबसे भीषण प्राकृतिक त्रासदियों में से एक का सामना कर रहा है। शुरुआती राहत कार्य शुरू हुए, लेकिन तबाही इतनी व्यापक थी कि स्थानीय प्रशासन के संसाधन कम पड़ने लगे। अस्पताल भर चुके थे, एम्बुलेंस लगातार दौड़ रही थीं और हजारों लोग खुले मैदानों में रात बिताने को मजबूर थे।
ऐसे समय में हजारों किलोमीटर दूर भारत से एक खबर आई, जिसने राहत कार्य में नई उम्मीद जगा दी। भारत सरकार ने बिना देर किए ‘ऑपरेशन अमिस्ताद’ शुरू करने का फैसला लिया। भारतीय वायुसेना के विशाल C-17 ग्लोबमास्टर विमान राहत सामग्री, सेना के डॉक्टरों, आधुनिक चिकित्सा उपकरणों और फील्ड हॉस्पिटल के साथ वेनेज़ुएला के लिए रवाना हुए। यह सिर्फ राहत मिशन नहीं था, बल्कि उस मानवीय सोच का उदाहरण था, जिसमें सीमाओं से पहले इंसानियत को रखा जाता है।

जब पूरा शहर मलबे में बदल गया
भूकंप का केंद्र भले किसी एक इलाके में रहा हो, लेकिन उसका असर कई शहरों तक महसूस किया गया। जिन इलाकों में पुराने मकान और कमजोर इमारतें थीं, वहां सबसे ज्यादा नुकसान हुआ। कई बहुमंजिला इमारतें कुछ ही सेकंड में धराशायी हो गईं। सड़कों पर खड़ी गाड़ियां मलबे के नीचे दब गईं। बिजली व्यवस्था ठप हो गई और मोबाइल नेटवर्क भी कई घंटों तक प्रभावित रहा।
राहतकर्मी जब घटनास्थल पर पहुंचे तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि बचाव कार्य कहां से शुरू किया जाए। हर गली से मदद की आवाज आ रही थी। हर मोहल्ले में लोग अपने परिजनों को मलबे से निकालने की कोशिश कर रहे थे। कई जगहों पर स्थानीय लोगों ने अपने हाथों से पत्थर हटाने शुरू कर दिए, क्योंकि उन्हें डर था कि मशीनों के आने तक बहुत देर हो जाएगी।
32 घंटे बाद मलबे से आई जिंदगी की आवाज
ऐसी त्रासदियों में कुछ पल ऐसे भी आते हैं, जो पूरी दुनिया को उम्मीद देना सिखाते हैं।
भूकंप के करीब 32 घंटे बाद बचाव दल एक ढही हुई इमारत के मलबे में काम कर रहा था। अचानक एक हल्की आवाज सुनाई दी। मशीनें रोक दी गईं। राहतकर्मी हाथों से मलबा हटाने लगे। कुछ देर बाद वहां से एक 11 वर्षीय बच्चा जीवित बाहर निकाला गया।
उस पल वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम थीं। किसी ने तालियां बजाईं, किसी ने ईश्वर का शुक्रिया अदा किया और कई राहतकर्मी भावुक होकर बच्चे को स्ट्रेचर तक लेकर पहुंचे। डॉक्टरों ने बताया कि बच्चा गंभीर रूप से घायल जरूर था, लेकिन उसकी सांसें सामान्य थीं। यह सिर्फ एक रेस्क्यू नहीं था, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए उम्मीद का संदेश था, जिनके अपने अब भी मलबे के नीचे फंसे हुए थे।
भारत ने क्यों दिखाई इतनी तेजी?
प्राकृतिक आपदाओं में समय सबसे बड़ा हथियार होता है। जितनी जल्दी राहत टीमें पहुंचती हैं, उतनी ज्यादा जानें बचाई जा सकती हैं।
यही वजह रही कि भारत ने औपचारिक प्रक्रियाओं का इंतजार करने के बजाय तुरंत राहत अभियान शुरू किया। ऑपरेशन अमिस्ताद के तहत भेजी गई टीम में सेना के अनुभवी डॉक्टर, ट्रॉमा विशेषज्ञ, सर्जन, नर्सिंग स्टाफ और मेडिकल टेक्नीशियन शामिल थे। उनके साथ पोर्टेबल ऑपरेशन थिएटर, एक्स-रे मशीनें, वेंटिलेटर, दवाइयां और ऐसा फील्ड हॉस्पिटल भी भेजा गया, जिसे कुछ घंटों में किसी भी खुले मैदान में स्थापित किया जा सकता है।
भारतीय टीम का उद्देश्य सिर्फ दवाइयां पहुंचाना नहीं था, बल्कि वहां की टूट चुकी स्वास्थ्य व्यवस्था को तत्काल सहारा देना भी था।

जब भारतीय डॉक्टरों ने संभाला मोर्चा
Venezuela पहुंचने के बाद भारतीय मेडिकल टीम ने सबसे पहले उन इलाकों का रुख किया, जहां अस्पताल या तो क्षतिग्रस्त हो चुके थे या मरीजों से पूरी तरह भर चुके थे।
फील्ड हॉस्पिटल में लगातार ऑपरेशन किए गए। कई मरीजों का मौके पर ही इलाज शुरू किया गया। किसी का हाथ टूट गया था, किसी के सिर में गंभीर चोट थी, तो कई लोग घंटों तक मलबे में दबे रहने की वजह से डिहाइड्रेशन और संक्रमण का शिकार हो चुके थे।
भारतीय सेना के डॉक्टरों ने दिन-रात एक कर मरीजों का इलाज किया। भाषा अलग थी, संस्कृति अलग थी, लेकिन इलाज के दौरान सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा सिर्फ इंसानियत थी।
हर घंटे बढ़ रही थी चुनौती
राहत कार्य आसान नहीं था। आफ्टरशॉक लगातार महसूस किए जा रहे थे। कई इमारतें ऐसी थीं जो आधी टूट चुकी थीं और किसी भी समय गिर सकती थीं। इसके बावजूद बचाव दल मलबे में फंसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश करता रहा।
भारी मशीनों के साथ-साथ प्रशिक्षित रेस्क्यू टीमें, स्निफर डॉग और थर्मल कैमरों की मदद ली गई। कई जगह मशीनों का इस्तेमाल रोककर हाथों से मलबा हटाया गया, ताकि अंदर फंसे लोगों को कोई नुकसान न पहुंचे।
यही वह दौर था जब हर मिनट की कीमत थी। क्योंकि विशेषज्ञों के मुताबिक भूकंप के बाद शुरुआती 72 घंटे किसी भी राहत अभियान के लिए सबसे निर्णायक माने जाते हैं।
दुनिया की नजरें वेनेज़ुएला पर
जैसे-जैसे तबाही की तस्वीरें सामने आती गईं, दुनिया के कई देशों ने सहायता की घोषणा की। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां, अंतरराष्ट्रीय राहत संगठन और कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी मौके पर पहुंचीं। लेकिन शुरुआती चरण में भारत का राहत अभियान सबसे तेज और व्यवस्थित अभियानों में शामिल रहा।
भारतीय टीम सिर्फ चिकित्सा सहायता ही नहीं लाई, बल्कि उसने यह भी दिखाया कि आपदा के समय वैश्विक सहयोग किस तरह लोगों की जिंदगी बदल सकता है।
Operation Amistad: जब हर तरफ मलबा था, तब भारतीय डॉक्टरों ने अस्पताल नहीं, भरोसा खड़ा किया
भूकंप के बाद किसी शहर की सबसे बड़ी जरूरत सिर्फ राहत सामग्री नहीं होती। सबसे पहले जरूरत होती है डॉक्टरों की, दवाइयों की और उन लोगों की जो यह भरोसा दिला सकें कि अभी सब खत्म नहीं हुआ है। वेनेज़ुएला में भी कुछ ऐसा ही हुआ। कई अस्पताल खुद भूकंप की चपेट में आ गए थे। जहां इमारतें सुरक्षित थीं, वहां मरीजों की संख्या अचानक इतनी बढ़ गई कि डॉक्टरों के लिए हर घायल तक समय पर पहुंचना मुश्किल हो गया।
ऐसे हालात में भारत की मेडिकल टीम ने सिर्फ इलाज नहीं किया, बल्कि वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था का बोझ भी अपने कंधों पर उठाया। सेना के डॉक्टरों ने खुले मैदानों में अस्थायी मेडिकल यूनिट तैयार की। कहीं प्लास्टर चढ़ाया जा रहा था, कहीं ऑपरेशन हो रहे थे और कहीं ऐसे लोगों को प्राथमिक उपचार दिया जा रहा था, जो कई घंटे मलबे में दबे रहने के कारण गंभीर संक्रमण का शिकार हो चुके थे।
राहत अभियान में शामिल अधिकारियों के मुताबिक सबसे चुनौतीपूर्ण काम उन लोगों का इलाज था, जिन्हें समय पर चिकित्सा नहीं मिल पाई थी। कई मरीजों के शरीर में गंभीर फ्रैक्चर थे, कई लोगों की हड्डियां कुचल चुकी थीं और बड़ी संख्या में बच्चे मानसिक आघात से गुजर रहे थे। ऐसे मामलों में सिर्फ दवा देना काफी नहीं था, उन्हें मानसिक सहारा देना भी उतना ही जरूरी था।

मलबा हटाना आसान था, लोगों का डर निकालना मुश्किल
भूकंप थम चुका था, लेकिन डर नहीं।
हर कुछ घंटे बाद महसूस होने वाले हल्के झटके लोगों को फिर सड़कों पर ले आते थे। जिन परिवारों ने अपने घर खो दिए, वे इमारतों के पास जाने से भी डर रहे थे। हजारों लोगों ने खुले मैदानों, स्कूलों और अस्थायी राहत शिविरों में रातें बितानी शुरू कर दीं।
बच्चे हर तेज आवाज पर घबरा जाते थे। कई ऐसे लोग भी मिले जो अपने किसी परिजन का शव मिलने का इंतजार कर रहे थे। राहत शिविरों में भोजन और दवाइयों के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक सहायता की भी जरूरत महसूस की जाने लगी। यही वह पहलू है, जो किसी भी बड़ी प्राकृतिक आपदा के बाद सबसे ज्यादा प्रभावित करता है, लेकिन अक्सर सुर्खियों में नहीं आ पाता।
एक बच्चे का बचना पूरी दुनिया के लिए उम्मीद क्यों बन गया
राहत अभियान के तीसरे दिन जब बचाव दल ने 11 वर्षीय बच्चे को जीवित बाहर निकाला, तो यह सिर्फ एक सफल रेस्क्यू नहीं था। उस तस्वीर ने दुनिया को यह संदेश दिया कि मलबे के नीचे अभी भी जिंदगी मौजूद हो सकती है।
उस घटना के बाद कई इलाकों में राहत टीमों ने अपना अभियान और तेज कर दिया। स्थानीय स्वयंसेवकों का मनोबल भी बढ़ा। कई परिवार, जो लगभग उम्मीद छोड़ चुके थे, फिर से बचाव दल के साथ मलबे के पास खड़े दिखाई देने लगे।
आपदाओं में ऐसे पल बहुत मायने रखते हैं। वे आंकड़ों से ज्यादा इंसानी हौसले की कहानी कहते हैं।
भारत के लिए यह सिर्फ राहत अभियान नहीं था
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आए संकट के समय तेजी से मदद पहुंचाई है। चाहे नेपाल का भूकंप हो, तुर्किये में आई तबाही हो या फिर युद्ध प्रभावित क्षेत्रों से लोगों को निकालने का अभियान—नई दिल्ली ने लगातार यह संदेश दिया है कि मानवीय सहायता उसकी विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
‘ऑपरेशन अमिस्ताद’ भी उसी सोच का विस्तार माना जा रहा है।
इस अभियान ने यह दिखाया कि भारत अब सिर्फ अपने नागरिकों तक सीमित नहीं है। जब दुनिया के किसी हिस्से में बड़ा मानवीय संकट खड़ा होता है, तो भारत संसाधनों और विशेषज्ञों के साथ मदद के लिए आगे आता है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस मिशन की चर्चा हो रही है।
वेनेज़ुएला के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
राहत कार्य धीरे-धीरे पुनर्वास की ओर बढ़ेगा, लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी।
हजारों लोगों के घर पूरी तरह नष्ट हो चुके हैं। स्कूलों, अस्पतालों और सरकारी इमारतों को फिर से खड़ा करना होगा। जिन परिवारों ने अपने कमाने वाले सदस्य खो दिए, उनके सामने रोजमर्रा की जिंदगी चलाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
इसके अलावा साफ पानी, बिजली और संचार व्यवस्था को सामान्य बनाने में भी लंबा समय लग सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इतनी बड़ी प्राकृतिक आपदा के बाद किसी भी देश को सामान्य स्थिति में लौटने में कई महीने, और कई बार वर्षों का समय लग जाता है।
इस त्रासदी ने दुनिया को क्या सिखाया?
Venezuela का भूकंप सिर्फ एक देश की त्रासदी नहीं है। यह पूरी दुनिया के लिए एक चेतावनी भी है कि आपदा प्रबंधन, मजबूत इमारतें और त्वरित राहत व्यवस्था कितनी जरूरी है।
भूकंप को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उससे होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जिन इलाकों में भवन निर्माण के नियमों का पालन हुआ, वहां नुकसान अपेक्षाकृत कम रहा। जबकि कमजोर ढांचे कुछ सेकंड के भीतर ढह गए।
इसी तरह यह आपदा यह भी याद दिलाती है कि किसी संकट की घड़ी में देशों के बीच सहयोग कितना महत्वपूर्ण होता है। अगर राहत टीमें समय पर नहीं पहुंचतीं, तो मृतकों की संख्या कहीं अधिक हो सकती थी।

निष्कर्ष
Venezuela की यह त्रासदी लंबे समय तक याद रखी जाएगी। सिर्फ इसलिए नहीं कि इसने हजारों लोगों की जिंदगी बदल दी, बल्कि इसलिए भी कि इसने दुनिया को इंसानियत की ताकत फिर से दिखाई।
जब मलबे के नीचे दबे लोगों की सांसें कमजोर पड़ रही थीं, तब अलग-अलग देशों से पहुंची राहत टीमों ने उम्मीद को जिंदा रखा। उनमें भारत का ‘ऑपरेशन अमिस्ताद’ सबसे अलग इसलिए नजर आया, क्योंकि उसने सिर्फ राहत सामग्री नहीं भेजी, बल्कि डॉक्टर, फील्ड हॉस्पिटल और वह भरोसा भी भेजा जिसकी किसी भी आपदा के बाद सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
आंकड़े समय के साथ बदल जाएंगे। मृतकों की संख्या बढ़ सकती है, लापता लोगों की सूची छोटी या बड़ी हो सकती है। लेकिन इतिहास जब इस त्रासदी को याद करेगा, तो उन लोगों को भी याद रखेगा जिन्होंने मलबे के बीच खड़े होकर हार मानने से इनकार कर दिया था।
और शायद यही किसी भी राहत अभियान की सबसे बड़ी सफलता होती है—वह सिर्फ जिंदगी नहीं बचाता, बल्कि उम्मीद को भी जिंदा रखता है।
After the devastating earthquakes in Venezuela, rescuers pulled an 18-day-old baby alive from the rubble of a collapsed building. The baby was handed back to his father, and about 90 minutes later, crews also rescued the child’s mother. pic.twitter.com/hLYSzBDh4k
— Dudes Posting Their W’s (@DudespostingWs) June 27, 2026