कोलकाता की राजनीति में एक समय ऐसा था जब ममता बनर्जी के मंच पर अगर किसी नेता की मौजूदगी सबसे ज्यादा मायने रखती थी, तो उनमें Suvendu Adhikari का नाम सबसे ऊपर लिया जाता था। पूर्व मेदिनीपुर से आने वाला यह नेता सिर्फ एक संगठनकर्ता नहीं था, बल्कि तृणमूल कांग्रेस की जमीनी ताकत का बड़ा चेहरा माना जाता था। taazanews24x7.com
लेकिन राजनीति का खेल शायद सबसे ज्यादा पश्चिम बंगाल में बदलता है। यहां रिश्ते भी स्थायी नहीं होते और विरोध भी हमेशा के लिए नहीं रहता। यही वजह है कि जिस नेता ने कभी ममता बनर्जी के लिए गांव-गांव जाकर संघर्ष किया, वही नेता आज भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा बंगाली चेहरा बन चुका है।
Suvendu Adhikari की कहानी सिर्फ एक नेता के पार्टी बदलने की कहानी नहीं है। यह बंगाल की बदलती राजनीति, टूटते समीकरण और सत्ता की उस लड़ाई की कहानी है जिसने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा।
आज जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस आमने-सामने खड़ी हैं, तब इस टकराव के केंद्र में एक नाम सबसे ज्यादा दिखाई देता है — सुवेंदु अधिकारी।

राजनीति विरासत में मिली, लेकिन पहचान खुद बनाई
पूर्व मेदिनीपुर जिले के कांथी इलाके में पैदा हुए Suvendu Adhikari ऐसे परिवार से आते हैं, जहां राजनीति कोई नई चीज नहीं थी। उनके पिता सिसिर अधिकारी लंबे समय तक कांग्रेस और बाद में तृणमूल कांग्रेस की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे।
घर में लगातार राजनीतिक चर्चा होती थी। चुनावी रणनीतियों से लेकर जनता की समस्याओं तक, सब कुछ Suvendu Adhikari बचपन से देखते-सुनते हुए बड़े हुए।
लेकिन बंगाल की राजनीति में सिर्फ राजनीतिक परिवार से होना काफी नहीं माना जाता। यहां जनता आपको तभी स्वीकार करती है जब आप सड़क पर उतरकर संघर्ष करें।
Suvendu Adhikari ने यही किया।
कॉलेज के दिनों में छात्र राजनीति से शुरुआत हुई। उस समय कांग्रेस कमजोर हो रही थी और ममता बनर्जी अपनी अलग पहचान बना रही थीं। जब ममता ने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई, तब कई युवा नेताओं की तरह सुवेंदु अधिकारी भी उनके साथ आ गए।
यहीं से उनकी असली राजनीतिक यात्रा शुरू हुई।
गांवों में काम करने वाला नेता
Suvendu Adhikari की राजनीति शुरू से ही अलग मानी जाती रही।
वे उन नेताओं में शामिल नहीं थे जो सिर्फ कोलकाता में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते नजर आते हों। उनकी असली ताकत गांवों में दिखाई देती थी।
पूर्व मेदिनीपुर, नंदीग्राम और आसपास के इलाकों में उन्होंने लगातार संगठन खड़ा किया। पंचायत स्तर तक कार्यकर्ताओं का नेटवर्क बनाया।
तृणमूल कांग्रेस के शुरुआती दिनों में पार्टी के पास संसाधन कम थे, लेकिन जमीनी कार्यकर्ता मजबूत थे। Suvendu Adhikari इसी ताकत का हिस्सा बने।
धीरे-धीरे उनकी पहचान ऐसे नेता की बनने लगी जो चुनाव जिताने की क्षमता रखता है।
नंदीग्राम आंदोलन ने बदल दी किस्मत
अगर बंगाल की राजनीति में पिछले 20 साल की सबसे बड़ी घटनाओं की सूची बनाई जाए, तो नंदीग्राम आंदोलन का नाम सबसे ऊपर होगा।
2007 में वाम मोर्चा सरकार ने इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट के लिए जमीन अधिग्रहण का फैसला किया। गांवों में इसका विरोध शुरू हुआ। किसानों को डर था कि उनकी जमीन चली जाएगी और बदले में उन्हें कुछ नहीं मिलेगा।
यहीं से आंदोलन शुरू हुआ।
उस समय Suvendu Adhikari ने जिस तरह आंदोलन की कमान संभाली, उसने उन्हें रातोंरात पूरे बंगाल में चर्चित कर दिया।
वे लगातार गांवों में जाते, लोगों से बात करते, धरनों में शामिल होते और सरकार के खिलाफ आक्रामक भाषण देते।
उस दौर में टीवी चैनलों पर बार-बार एक चेहरा दिखाई देता था — सफेद कुर्ता पहने, तेज आवाज में बोलता हुआ सुवेंदु अधिकारी।
नंदीग्राम आंदोलन धीरे-धीरे सिर्फ जमीन का मुद्दा नहीं रहा। यह वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से का प्रतीक बन गया।
राजनीतिक विश्लेषक आज भी मानते हैं कि नंदीग्राम आंदोलन ने बंगाल में 34 साल पुरानी वाम सरकार की नींव हिला दी थी।

ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शामिल
2011 में जब तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई, तब ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद नेताओं की सूची में Suvendu Adhikari का नाम प्रमुखता से लिया जाता था।
सरकार बनने के बाद उन्हें लगातार बड़ी जिम्मेदारियां मिलीं।
वे सांसद बने, मंत्री बने और कई महत्वपूर्ण विभाग उनके पास आए।
पूर्व मेदिनीपुर में उनका प्रभाव इतना मजबूत था कि वहां पार्टी का पूरा ढांचा लगभग उनके नियंत्रण में माना जाता था।
तृणमूल कांग्रेस के अंदर भी लोग उन्हें संगठन का मजबूत खिलाड़ी मानते थे।
लेकिन राजनीति में ताकत जितनी तेजी से बढ़ती है, उतनी ही तेजी से टकराव भी शुरू हो जाते हैं।
फिर क्यों आई दरार?
2018 के बाद बंगाल की राजनीति बदलने लगी। बीजेपी तेजी से उभर रही थी। दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस के अंदर भी नई शक्ति संरचना बन रही थी।
इसी दौरान यह चर्चा तेज हुई कि Suvendu Adhikari पार्टी में खुद को पहले जैसा प्रभावशाली महसूस नहीं कर रहे।
हालांकि सार्वजनिक मंचों पर लंबे समय तक उन्होंने कुछ नहीं कहा, लेकिन राजनीतिक गलियारों में खबरें चलने लगीं कि पार्टी नेतृत्व और उनके बीच दूरी बढ़ रही है।
धीरे-धीरे उन्होंने पार्टी कार्यक्रमों से दूरी बनानी शुरू की।
फिर वह दिन आया जब उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़ने का फैसला कर लिया।
यह सिर्फ एक इस्तीफा नहीं था। यह बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक झटका था।
बीजेपी में शामिल होने के बाद बदल गया माहौल
जब Suvendu Adhikari बीजेपी में शामिल हुए, तब पार्टी को बंगाल में एक ऐसे चेहरे की तलाश थी जो स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखता हो।
दिल्ली के नेताओं के दम पर बीजेपी वोट तो बढ़ा रही थी, लेकिन उसे ऐसा नेता चाहिए था जो बंगाल की राजनीति की भाषा समझता हो।
सुवेंदु अधिकारी ने यह खाली जगह भर दी।
उनके बीजेपी में आने के बाद पार्टी का आत्मविश्वास बढ़ गया।
उन्होंने गांवों में जाकर बीजेपी के लिए माहौल बनाया। कई पुराने तृणमूल कार्यकर्ता भी उनके साथ बीजेपी में शामिल हुए।
यहीं से बंगाल का चुनावी मुकाबला पूरी तरह बदल गया।

नंदीग्राम में गुरु और शिष्य आमने-सामने
2021 विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक ड्रामा नंदीग्राम में देखने को मिला।
ममता banerjee ने खुद इस सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया। बीजेपी ने उनके सामने Suvendu Adhikari को उम्मीदवार बना दिया।
पूरा देश इस मुकाबले को देख रहा था।
एक तरफ ममता बनर्जी थीं, जिन्होंने Suvendu Adhikari को राजनीति में बड़ा मंच दिया था। दूसरी तरफ वही सुवेंदु अधिकारी थे, जो अब उन्हें चुनौती दे रहे थे।
चुनाव प्रचार बेहद तीखा रहा। दोनों पक्षों ने पूरी ताकत झोंक दी।
नतीजे आए तो सुवेंदु अधिकारी ने बेहद करीबी मुकाबले में ममता बनर्जी को हरा दिया।
हालांकि तृणमूल कांग्रेस ने सरकार बना ली, लेकिन नंदीग्राम की हार ने बंगाल की राजनीति में बड़ा संदेश दे दिया — सुवेंदु अधिकारी अब सिर्फ क्षेत्रीय नेता नहीं रहे।
नेता प्रतिपक्ष के तौर पर आक्रामक राजनीति
चुनाव के बाद बीजेपी ने उन्हें विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया।
इसके बाद उनका राजनीतिक अंदाज और ज्यादा आक्रामक हो गया।
वे लगातार ममता सरकार को घेरते रहे। शिक्षक भर्ती घोटाला, भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर उन्होंने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस और बयान अक्सर राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बनने लगे।
बीजेपी समर्थकों के बीच उनकी छवि “फाइटर” नेता की बन गई।
विवादों ने भी नहीं छोड़ा साथ
सुवेंदु अधिकारी की राजनीति जितनी आक्रामक रही, विवाद भी उतने ही जुड़े रहे।
उनके कई बयान विपक्ष के निशाने पर आए। तृणमूल कांग्रेस ने उन पर कई बार सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया।
इसके अलावा उनके खिलाफ कानूनी मामलों को लेकर भी बहस होती रही।
हालांकि बीजेपी का कहना है कि यह सब राजनीतिक बदले की कार्रवाई है।
बंगाल की राजनीति में जिस तरह टकराव बढ़ा है, उसमें विवाद लगभग हर बड़े नेता के साथ जुड़े दिखाई देते हैं।

जनता के बीच कैसी है पकड़?
अगर आप पूर्व मेदिनीपुर जाएं, तो वहां आज भी सुवेंदु अधिकारी का मजबूत प्रभाव देखने को मिलेगा।
स्थानीय लोग उन्हें ऐसा नेता मानते हैं जो सीधे जनता से जुड़ता है।
उनके समर्थकों का कहना है कि वे सिर्फ चुनाव के समय नहीं आते, बल्कि लगातार इलाके में सक्रिय रहते हैं।
यही वजह है कि उनकी राजनीतिक पकड़ सिर्फ पार्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत स्तर पर भी मजबूत मानी जाती है।
बीजेपी के लिए क्यों जरूरी हैं सुवेंदु?
बंगाल की राजनीति हमेशा क्षेत्रीय पहचान के इर्द-गिर्द घूमती रही है।
बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि पार्टी को ऐसा स्थानीय चेहरा मिले जिस पर बंगाली वोटर भरोसा कर सके।
सुवेंदु अधिकारी ने बीजेपी के लिए यही भूमिका निभाई।
वे बंगाल की भाषा, संस्कृति और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को समझते हैं।
उनकी राजनीतिक शैली भी पूरी तरह बंगाल की जमीनी राजनीति से जुड़ी हुई है।
क्या भविष्य में बन सकते हैं मुख्यमंत्री?
बीजेपी के भीतर अब यह चर्चा खुलकर होने लगी है कि अगर पार्टी बंगाल में पूर्ण बहुमत हासिल करती है, तो मुख्यमंत्री पद का सबसे बड़ा चेहरा सुवेंदु अधिकारी ही होंगे।
उनकी लोकप्रियता और संगठन पर पकड़ को देखते हुए पार्टी भी उन्हें आगे बढ़ा रही है।
हालांकि बंगाल की राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं माना जाता। यहां समीकरण बहुत तेजी से बदलते हैं।
लेकिन फिलहाल बीजेपी के पास उनसे बड़ा बंगाली चेहरा नजर नहीं आता।
बंगाल की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल
आज पश्चिम बंगाल की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है।
एक तरफ ममता बनर्जी हैं, जिन्होंने राज्य की राजनीति को 15 साल से ज्यादा समय तक नियंत्रित किया। दूसरी तरफ सुवेंदु अधिकारी हैं, जो खुद को सबसे बड़े चुनौतीकर्ता के रूप में स्थापित कर चुके हैं।
क्या वे बीजेपी को सत्ता तक पहुंचा पाएंगे?
क्या बंगाल की राजनीति पूरी तरह दो ध्रुवों में बंट जाएगी?
क्या तृणमूल कांग्रेस अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी?
इन सवालों का जवाब आने वाले वर्षों में मिलेगा।

निष्कर्ष
सुवेंदु अधिकारी की राजनीतिक यात्रा बंगाल की राजनीति की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक है।
एक ऐसा नेता जिसने ममता बनर्जी के साथ मिलकर वाम मोर्चा को सत्ता से बाहर किया, वही नेता आज उनके खिलाफ सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुका है।
उनके समर्थक उन्हें जमीनी और संघर्षशील नेता बताते हैं। विरोधी उन्हें आक्रामक राजनीति का चेहरा मानते हैं।
लेकिन एक बात तय है — आज पश्चिम बंगाल की राजनीति में सुवेंदु अधिकारी को नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के लिए संभव नहीं है।
श्री सुवेंदु अधिकारी जी को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण करने पर हार्दिक शुभकामनाएं|
— Ameet Satam (@AmeetSatam) May 9, 2026
आपके नेतृत्व में पश्चिम बंगाल एक सशक्त, सुरक्षित और विकसित राज्य के रूप में नई पहचान बनाएगा। देश के आदरणीय प्रधानमंत्री श्री. नरेंद्र मोदी जी के विजन और आपके संकल्प के साथ राज्य… pic.twitter.com/CIfl4fINJz