नई दिल्ली।
दलाल स्ट्रीट पर शुक्रवार की सुबह सामान्य नहीं थी। पिछले पांच कारोबारी सत्रों से लगातार चढ़ते बाजार को देखकर निवेशकों में उत्साह था। उम्मीद की जा रही थी कि सेंसेक्स और निफ्टी एक बार फिर नई ऊंचाई की ओर बढ़ेंगे। लेकिन जैसे ही कारोबार शुरू हुआ, माहौल बदलने में ज्यादा समय नहीं लगा। ट्रेडिंग टर्मिनल पर हरे रंग की जगह लाल रंग तेजी से फैलने लगा और कुछ ही मिनटों में साफ हो गया कि बाजार आज दबाव में रहने वाला है।
सबसे ज्यादा बेचैनी आईटी सेक्टर में दिखाई दी। देश की सबसे बड़ी टेक कंपनियों के शेयरों में एक साथ ऐसी बिकवाली शुरू हुई कि अनुभवी निवेशक भी हैरान रह गए। टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो, एचसीएल टेक, टेक महिंद्रा और एलटीआईमाइंडट्री जैसे दिग्गज शेयर लगातार नीचे फिसलते रहे। कारोबार के शुरुआती घंटों में ही आईटी कंपनियों की संयुक्त मार्केट वैल्यू से करीब ₹1.35 लाख करोड़ साफ हो गए। इन्फोसिस और टीसीएस जैसे ब्लूचिप शेयर 52 सप्ताह के निचले स्तर के करीब पहुंच गए, जबकि निफ्टी आईटी इंडेक्स में लगभग 6 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज हुई। taazanews24x7.com
पहली नजर में यह गिरावट सिर्फ एक कारोबारी दिन की हलचल लग सकती है, लेकिन इसकी जड़ें हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका में थीं। वहां आईटी कंसल्टिंग दिग्गज Accenture ने अपने ताजा कारोबारी आउटलुक में कुछ ऐसे संकेत दिए, जिन्होंने वैश्विक टेक सेक्टर के भविष्य को लेकर नई चिंता पैदा कर दी। भारतीय बाजार ने उसी चिंता पर प्रतिक्रिया दी।

अमेरिका से उठी हलचल, भारत तक पहुंचा असर
वैश्विक आईटी उद्योग में Accenture को एक ट्रेंड इंडिकेटर माना जाता है। कंपनी दुनिया की हजारों बड़ी कंपनियों को डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, क्लाउड, साइबर सिक्योरिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़ी सेवाएं देती है। यही वजह है कि उसके नतीजों और प्रबंधन की टिप्पणियों पर दुनिया भर के निवेशकों की नजर रहती है।
इस बार कंपनी के तिमाही नतीजे उम्मीद से बहुत खराब नहीं थे। असली चिंता उसके भविष्य को लेकर दिए गए संकेतों ने पैदा की। कंपनी ने माना कि कई बड़े ग्राहक नई टेक्नोलॉजी परियोजनाओं पर फैसला लेने में पहले से अधिक समय ले रहे हैं। कुछ कॉरपोरेट समूह अपने आईटी बजट की समीक्षा कर रहे हैं, जबकि कई कंपनियां खर्च को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं।
शेयर बाजार में अक्सर आंकड़ों से ज्यादा महत्व भविष्य की उम्मीदों का होता है। इसलिए निवेशकों ने इसे केवल Accenture की टिप्पणी नहीं माना, बल्कि पूरी आईटी इंडस्ट्री के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा।
भारतीय आईटी कंपनियां तुरंत दबाव में क्यों आ गईं?
यह सवाल स्वाभाविक है कि अमेरिका की एक कंपनी की टिप्पणी से भारत के शेयरों में इतनी बड़ी गिरावट कैसे आ सकती है।
दरअसल, भारत की बड़ी आईटी कंपनियों का कारोबार घरेलू बाजार से ज्यादा विदेशी ग्राहकों पर निर्भर करता है। टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएल टेक और विप्रो जैसी कंपनियों की आय का बड़ा हिस्सा अमेरिका और यूरोप से आता है। बैंकिंग, हेल्थकेयर, रिटेल, मैन्युफैक्चरिंग और इंश्योरेंस सेक्टर की वैश्विक कंपनियां इनके प्रमुख ग्राहक हैं।
यदि वही कंपनियां अपने आईटी खर्च को सीमित करने लगें या नई परियोजनाओं को टाल दें, तो भारतीय आईटी कंपनियों के ऑर्डर, रेवेन्यू ग्रोथ और मुनाफे पर सीधा असर पड़ सकता है। बाजार ने इसी संभावना को ध्यान में रखते हुए आईटी शेयरों में आक्रामक बिकवाली शुरू कर दी।
सिर्फ शेयर नहीं गिरे, भरोसा भी डगमगाया
बाजार में गिरावट केवल आंकड़ों की कहानी नहीं होती। उसके पीछे निवेशकों की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया भी काम करती है।
शुक्रवार को यही देखने को मिला। बड़े विदेशी फंड, घरेलू संस्थागत निवेशक और रिटेल ट्रेडर—तीनों वर्गों ने जोखिम कम करने की कोशिश की। जिन शेयरों में पिछले महीनों में अच्छी तेजी आई थी, उनमें सबसे पहले मुनाफावसूली शुरू हुई।
इन्फोसिस और टीसीएस जैसे शेयरों में इसलिए ज्यादा दबाव दिखा क्योंकि ये विदेशी निवेशकों की पहली पसंद रहे हैं। जब ग्लोबल फंड किसी सेक्टर में जोखिम कम करते हैं तो सबसे पहले उन्हीं कंपनियों में बिकवाली होती है जिनमें उनकी हिस्सेदारी सबसे ज्यादा होती है।
यही वजह रही कि कुछ ही घंटों के भीतर आईटी सेक्टर की तस्वीर पूरी तरह बदल गई। जो कंपनियां कुछ दिन पहले तक बाजार की मजबूती का आधार थीं, वही शुक्रवार को गिरावट की सबसे बड़ी वजह बन गईं।

Accenture के अपने शेयरों में भी ऐतिहासिक गिरावट
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि दबाव केवल भारतीय कंपनियों पर नहीं था। अमेरिकी बाजार में भी Accenture के शेयरों में एक दिन की बड़ी गिरावट दर्ज की गई। कंपनी के मार्केट कैप में अरबों डॉलर की कमी आई और उसके साथ कई दूसरी वैश्विक टेक कंपनियों के शेयर भी दबाव में आ गए।
भारतीय निवेशकों ने इसे एक अलग-थलग घटना नहीं माना। उनका आकलन था कि यदि दुनिया की सबसे बड़ी आईटी सर्विस कंपनियों में से एक भविष्य को लेकर सतर्क है, तो आने वाली तिमाहियों में भारतीय कंपनियों के लिए भी कारोबारी माहौल आसान नहीं रहने वाला।
यही सोच शुक्रवार की बिकवाली की सबसे बड़ी वजह बनी।
क्या केवल Accenture की चेतावनी से आई इतनी बड़ी गिरावट?
बाजार में शायद ही कभी कोई बड़ी गिरावट किसी एक वजह से आती है। शुक्रवार को भी तस्वीर कुछ ऐसी ही रही। Accenture की टिप्पणी ने चिंगारी का काम जरूर किया, लेकिन आग पहले से तैयार माहौल में लगी।
पिछले कुछ महीनों में भारतीय आईटी शेयरों ने अच्छी तेजी दिखाई थी। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर बढ़ते उत्साह, विदेशी निवेशकों की खरीदारी और बेहतर तिमाही नतीजों की उम्मीद ने कई कंपनियों के शेयरों को ऊंचे वैल्यूएशन तक पहुंचा दिया था। जब किसी सेक्टर के शेयर उम्मीदों के सहारे लगातार ऊपर जाते हैं, तब छोटी-सी नकारात्मक खबर भी बड़ी बिकवाली की वजह बन जाती है।
शुक्रवार को ठीक यही हुआ। निवेशकों ने यह मानकर मुनाफावसूली शुरू कर दी कि आने वाले महीनों में आईटी कंपनियों की कमाई पहले जितनी तेज रफ्तार से नहीं बढ़ सकती।
AI का दौर, लेकिन पारंपरिक IT कंपनियों के सामने नई चुनौती
दो साल पहले तक डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, क्लाउड माइग्रेशन और एप्लिकेशन डेवलपमेंट आईटी कंपनियों की कमाई के सबसे बड़े स्रोत माने जाते थे। अब तस्वीर तेजी से बदल रही है।
दुनिया भर की कंपनियां अपना बजट जनरेटिव AI, ऑटोमेशन और डेटा प्लेटफॉर्म पर खर्च कर रही हैं। इसका फायदा भविष्य में आईटी कंपनियों को मिल सकता है, लेकिन फिलहाल संक्रमण का दौर चल रहा है।
कई पुराने प्रोजेक्ट या तो धीमे हो गए हैं या उनकी प्राथमिकता बदल गई है। ग्राहक पहले यह समझना चाहते हैं कि AI पर खर्च से उन्हें वास्तविक फायदा कितना मिलेगा। जब तक यह स्पष्ट नहीं होता, तब तक नए बड़े ऑर्डर आने की गति सीमित रह सकती है।
यही कारण है कि निवेशक अब केवल रेवेन्यू ग्रोथ नहीं देख रहे, बल्कि यह भी जानना चाहते हैं कि कौन-सी कंपनी AI से सबसे ज्यादा कमाई कर पाएगी।

विदेशी निवेशकों ने क्यों बढ़ाई बिकवाली?
भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। खासकर आईटी सेक्टर में उनकी हिस्सेदारी काफी अधिक है।
जब वैश्विक स्तर पर जोखिम बढ़ता है तो विदेशी फंड सबसे पहले उन सेक्टरों में अपनी हिस्सेदारी घटाते हैं, जहां उन्हें निकट भविष्य में ग्रोथ धीमी होने की आशंका दिखाई देती है।
शुक्रवार को भी यही रणनीति देखने को मिली। विदेशी निवेशकों ने आईटी शेयरों में बिकवाली की, जिसका असर घरेलू बाजार पर तुरंत दिखाई दिया। उनके बाद घरेलू फंड और खुदरा निवेशकों ने भी अपने पोर्टफोलियो का जोखिम कम करना शुरू कर दिया।
यानी गिरावट केवल भावनाओं की नहीं थी, बल्कि संस्थागत निवेशकों की रणनीति में आए बदलाव का भी नतीजा थी।
सेंसेक्स और निफ्टी पर कितना पड़ा असर?
आईटी सेक्टर भारतीय शेयर बाजार का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सेंसेक्स और निफ्टी दोनों में आईटी कंपनियों का अच्छा-खासा वेटेज है। इसलिए जब इस सेक्टर में एक साथ बड़ी गिरावट आती है, तो उसका असर पूरे बाजार पर दिखाई देता है।
शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स करीब 786 अंक तक टूट गया। निफ्टी भी महत्वपूर्ण स्तरों के नीचे फिसल गया। बैंकिंग, ऑटो और एफएमसीजी जैसे कुछ सेक्टरों ने गिरावट को सीमित करने की कोशिश की, लेकिन आईटी शेयरों में लगातार बिकवाली ने बाजार को संभलने का मौका नहीं दिया।
कई ब्रोकिंग हाउसों के ट्रेडिंग डेस्क पर उस समय सबसे अधिक ऑर्डर आईटी शेयर बेचने के ही आ रहे थे। इससे यह साफ हो गया कि निवेशकों का फोकस फिलहाल जोखिम कम करने पर है, न कि नई खरीदारी पर।
₹1.35 लाख करोड़ कैसे साफ हो गए?
यह आंकड़ा सुनने में बड़ा लगता है, लेकिन इसकी गणना का तरीका काफी सरल है।
किसी भी सूचीबद्ध कंपनी का बाजार मूल्य उसके शेयर के भाव और कुल जारी शेयरों के आधार पर तय होता है। जब किसी बड़ी कंपनी का शेयर 5 से 7 प्रतिशत तक गिरता है, तो उसकी मार्केट कैपिटलाइजेशन में हजारों करोड़ रुपये की कमी आ जाती है।
अब कल्पना कीजिए कि टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएल टेक, विप्रो, टेक महिंद्रा, एलटीआईमाइंडट्री, कोफोर्ज और एमफैसिस जैसी कई बड़ी कंपनियों के शेयर एक ही दिन में तेज गिर जाएं। ऐसे में पूरे सेक्टर की संयुक्त मार्केट वैल्यू में भारी कमी आना स्वाभाविक है।
यही वजह रही कि कुछ ही घंटों में आईटी कंपनियों की कुल बाजार पूंजी से लगभग ₹1.35 लाख करोड़ कम हो गए। यह नुकसान वास्तविक नकद निकासी नहीं, बल्कि कंपनियों के बाजार मूल्य में आई गिरावट को दर्शाता है।

क्या 52 सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंचना चिंता की बात है?
किसी शेयर का 52 सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंचना हमेशा यह नहीं बताता कि कंपनी कमजोर हो गई है। कई बार बाजार की धारणा (Market Sentiment) भी शेयरों को वास्तविक मूल्य से नीचे ले जाती है।
हालांकि यह संकेत जरूर मिलता है कि फिलहाल निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है।
इन्फोसिस और टीसीएस जैसी कंपनियां मजबूत बैलेंस शीट, स्थिर नकदी प्रवाह और वैश्विक ग्राहक आधार रखती हैं। लेकिन बाजार केवल वर्तमान स्थिति पर नहीं चलता, बल्कि भविष्य की संभावनाओं को पहले ही कीमतों में शामिल कर लेता है।
यही कारण है कि Accenture की चेतावनी के बाद भारतीय आईटी कंपनियों के शेयरों पर दबाव इतना अधिक दिखाई दिया।
क्या यह गिरावट लंबी चलेगी?
इस सवाल का सीधा जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।
यदि आने वाली तिमाहियों में अमेरिकी कंपनियां आईटी खर्च बढ़ाती हैं और भारतीय कंपनियों की ऑर्डर बुक मजबूत बनी रहती है, तो यह गिरावट अस्थायी साबित हो सकती है।
लेकिन अगर वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुस्ती बढ़ती है, कॉर्पोरेट खर्च लगातार घटता है और नए प्रोजेक्ट्स की रफ्तार धीमी रहती है, तो आईटी सेक्टर पर दबाव कुछ समय और बना रह सकता है।
यही वजह है कि अब बाजार की नजर केवल शेयरों की कीमत पर नहीं, बल्कि अगले कुछ महीनों में आने वाले तिमाही नतीजों, बड़े ऑर्डर, प्रबंधन की टिप्पणियों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़े संकेतकों पर होगी।
निवेशकों को अब क्या करना चाहिए? घबराहट नहीं, आंकड़ों के आधार पर लें फैसला
शुक्रवार की तेज गिरावट के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि अब निवेशकों की रणनीति क्या होनी चाहिए। क्या यह गिरावट खरीदारी का मौका है या फिर अभी इंतजार करना बेहतर होगा?
बाजार के जानकारों की राय है कि ऐसे समय में भावनाओं के आधार पर फैसला लेना सबसे बड़ी गलती हो सकती है। शेयर बाजार में गिरावट नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि मजबूत कंपनियों के शेयर भी समय-समय पर दबाव में आते रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि कमजोर कंपनियां गिरावट से उबर नहीं पातीं, जबकि मजबूत कंपनियां समय के साथ फिर से अपनी स्थिति बना लेती हैं।
भारतीय आईटी सेक्टर की बात करें तो टीसीएस, इन्फोसिस, एचसीएल टेक और विप्रो जैसी कंपनियों का कारोबार एक-दो तिमाहियों पर निर्भर नहीं करता। इनके पास दुनिया भर के हजारों ग्राहक हैं, अरबों डॉलर के दीर्घकालिक अनुबंध हैं और मजबूत नकदी भंडार भी है। ऐसे में केवल एक दिन की गिरावट देखकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
हालांकि इसका यह मतलब भी नहीं कि हर गिरावट खरीदारी का मौका होती है। निवेशकों को यह समझना होगा कि आने वाले महीनों में कंपनियों के नतीजे, नए ऑर्डर और प्रबंधन की रणनीति ही तय करेगी कि यह गिरावट अस्थायी है या लंबी अवधि की शुरुआत।
बाजार अब किन संकेतों पर नजर रखेगा?
शुक्रवार की बिकवाली के बाद निवेशकों का पूरा ध्यान अब कुछ अहम संकेतों पर रहेगा।
सबसे पहले, भारतीय आईटी कंपनियों के अप्रैल-जून तिमाही नतीजों पर बाजार की नजर होगी। केवल मुनाफा बढ़ना ही काफी नहीं होगा, बल्कि कंपनियां भविष्य के लिए क्या अनुमान देती हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण रहेगा।
दूसरा बड़ा संकेत अमेरिका से आएगा। यदि वहां की बड़ी कंपनियां टेक्नोलॉजी पर खर्च बढ़ाती हैं तो भारतीय आईटी कंपनियों के लिए यह सकारात्मक खबर होगी। लेकिन यदि आईटी बजट में कटौती जारी रहती है, तो दबाव कुछ समय और बना रह सकता है।
तीसरा पहलू आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है। निवेशक अब यह देखना चाहेंगे कि भारतीय कंपनियां AI को केवल चर्चा का विषय बना रही हैं या उससे वास्तविक कारोबार भी हासिल कर रही हैं।
इसके अलावा विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीद और बिकवाली पर भी सभी की नजर रहेगी। पिछले कुछ वर्षों में कई बार देखा गया है कि विदेशी फंडों की वापसी के साथ आईटी शेयरों में तेजी भी लौट आई।क्या भारतीय IT सेक्टर की ग्रोथ रुक जाएगी?
इस गिरावट के बाद यह सवाल भी तेजी से उठने लगा कि क्या भारत का आईटी उद्योग अब धीमी रफ्तार से आगे बढ़ेगा।
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी।
भारतीय आईटी कंपनियों की सबसे बड़ी ताकत उनका वैश्विक अनुभव, तकनीकी विशेषज्ञता और लागत के मुकाबले बेहतर सेवाएं हैं। दुनिया की कई बड़ी कंपनियां आज भी डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन, क्लाउड माइग्रेशन, साइबर सिक्योरिटी और डेटा मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों पर भरोसा करती हैं।
हां, इतना जरूर है कि आने वाले वर्षों में कारोबार का स्वरूप बदल सकता है। पारंपरिक सॉफ्टवेयर सेवाओं के साथ-साथ AI, मशीन लर्निंग, डेटा इंजीनियरिंग और ऑटोमेशन में निवेश बढ़ाना अब कंपनियों की मजबूरी भी है और अवसर भी।
जो कंपनियां इस बदलाव के साथ तेजी से खुद को ढाल लेंगी, उनके लिए भविष्य के अवसर पहले से बड़े हो सकते हैं।
छोटे निवेशकों के लिए सबसे बड़ी सीख
शुक्रवार की गिरावट ने एक बार फिर यह याद दिलाया कि शेयर बाजार में केवल तेजी हमेशा नहीं रहती। बाजार उम्मीदों पर चढ़ता है और आशंकाओं पर गिरता भी है।
ऐसे समय में कई छोटे निवेशक घबराकर नुकसान में शेयर बेच देते हैं। बाद में जब वही शेयर संभलते हैं तो उन्हें दोबारा खरीदना मुश्किल हो जाता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि किसी निवेशक ने मजबूत कंपनी में लंबी अवधि के लिए निवेश किया है, तो केवल एक दिन की गिरावट से अपनी रणनीति बदलने की जरूरत नहीं होती। दूसरी ओर, जिन लोगों ने केवल तेजी देखकर ऊंचे स्तर पर ट्रेडिंग के उद्देश्य से खरीदारी की थी, उन्हें जोखिम प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
हर गिरावट अवसर नहीं होती और हर तेजी स्थायी नहीं होती। इसलिए निवेश का फैसला हमेशा कंपनी की गुणवत्ता, कमाई की क्षमता और भविष्य की संभावनाओं को देखकर ही लेना चाहिए।
निष्कर्ष
शुक्रवार का कारोबारी सत्र भारतीय शेयर बाजार के लिए केवल एक सामान्य गिरावट नहीं था। इसने यह साफ कर दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में होने वाले बदलावों का असर भारतीय बाजार पर कितनी तेजी से पड़ सकता है।
Accenture के सतर्क आउटलुक ने दुनिया भर के निवेशकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या आईटी कंपनियों के लिए आने वाले महीने चुनौतीपूर्ण रहने वाले हैं। इसी आशंका ने भारतीय बाजार में तेज बिकवाली को जन्म दिया और कुछ ही घंटों में आईटी सेक्टर की लगभग ₹1.35 लाख करोड़ की बाजार पूंजी घट गई।
हालांकि बाजार का इतिहास यह भी बताता है कि ऐसे दौर हमेशा स्थायी नहीं होते। मजबूत कंपनियां कठिन समय में अपनी रणनीति बदलती हैं, नए अवसर तलाशती हैं और फिर से विकास की राह पकड़ती हैं। इसलिए आने वाले महीनों में सबसे महत्वपूर्ण होगा कंपनियों का वास्तविक प्रदर्शन, नए ऑर्डर, AI से जुड़ी रणनीति और वैश्विक मांग की दिशा।
फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे समझदारी भरा कदम यही होगा कि वे शोर-शराबे से दूर रहकर तथ्यों पर आधारित निर्णय लें। क्योंकि शेयर बाजार में अक्सर वही निवेशक सफल होते हैं जो घबराहट के समय धैर्य बनाए रखते हैं और तेजी के समय संयम नहीं खोते।
#Watch | Accenture के नतीजों ने बढ़ाई IT शेयरों की चिंता, IT इंडेक्स 5% से ज्यादा टूटा
— ET Now Swadesh (@ETNowSwadesh) June 19, 2026
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