आधा हिस्सा तो भारत का ही होगा… तेल के खेल पर Russian CEO ने कह दी बड़ी बात, दुनिया की नई ऑयल सुपरपावर बन रहा भारत

दुनिया की राजनीति, अर्थव्यवस्था और ताकत का सबसे बड़ा खेल अगर किसी चीज़ के इर्द-गिर्द घूमता है, तो वह है तेल। जिस देश के पास तेल है, उसके पास ताकत है, और जिस देश की तेल पर पकड़ मजबूत है, वही आने वाले समय की वैश्विक दिशा तय करता है। पिछले कई दशकों तक अमेरिका, सऊदी अरब, रूस और चीन इस खेल के बड़े खिलाड़ी माने जाते रहे। लेकिन अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। दुनिया की नजर अब भारत पर टिक गई है।

Russia की सबसे बड़ी तेल कंपनी रोसनेफ्ट के CEO इगोर सेचिन ने हाल ही में जो बयान दिया, उसने पूरी दुनिया का ध्यान भारत की तरफ खींच लिया। उन्होंने कहा कि अगले एक दशक में दुनिया में तेल की मांग जितनी बढ़ेगी, उसका लगभग आधा हिस्सा अकेले भारत से आएगा। यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि दुनिया की बदलती आर्थिक ताकत का सबसे बड़ा संकेत माना जा रहा है। taazanews24x7.com

आज भारत केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश नहीं है, बल्कि वह सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था भी है। सड़कों पर दौड़ती करोड़ों गाड़ियां, तेजी से बढ़ते शहर, नए एयरपोर्ट, बढ़ते उद्योग और हर दिन मजबूत होता इंफ्रास्ट्रक्चर यह साफ बता रहा है कि भारत की ऊर्जा भूख आने वाले समय में और बढ़ने वाली है।

आखिर क्यों बढ़ रही है भारत की तेल की मांग?

अगर पिछले दस सालों पर नजर डालें, तो भारत की अर्थव्यवस्था ने जिस रफ्तार से विस्तार किया है, उसी रफ्तार से ऊर्जा की जरूरत भी बढ़ी है। पहले जहां एक परिवार में एक बाइक होना बड़ी बात मानी जाती थी, वहीं अब छोटे शहरों में भी हर घर में दो-दो वाहन दिखाई देने लगे हैं। गांवों तक सड़कें पहुंच चुकी हैं। ई-कॉमर्स कंपनियों की डिलीवरी से लेकर कैब सर्विस और लॉजिस्टिक्स सेक्टर तक, हर चीज तेल पर निर्भर है।

भारत में हर दिन लाखों नए लोग मिडिल क्लास में शामिल हो रहे हैं। इसका सीधा असर पेट्रोल, डीजल और गैस की खपत पर पड़ रहा है। देश में हवाई यात्रा करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एयरलाइंस नई फ्लाइट्स जोड़ रही हैं। औद्योगिक उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। इन सबके बीच तेल की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच रही है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की तेल खपत में आने वाले वर्षों में भारी उछाल देखने को मिलेगा। यही वजह है कि दुनिया की बड़ी तेल कंपनियां भारत को भविष्य का सबसे बड़ा बाजार मान रही हैं।

Russia ने क्यों कहा भारत सबसे खास?

Russia और भारत के रिश्ते हमेशा से मजबूत रहे हैं, लेकिन Russia-यूक्रेन युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच ऊर्जा साझेदारी और गहरी हो गई। पश्चिमी देशों ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए रूसी तेल खरीदना जारी रखा।

भारत को Russia से भारी छूट पर कच्चा तेल मिला। इसका फायदा यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद भारत को काफी राहत मिली। Russia के लिए भी भारत एक बड़ा ग्राहक बनकर उभरा।

इसी वजह से रोसनेफ्ट के CEO इगोर सेचिन ने भारत को “बहुत खास” बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में भारत और चीन दुनिया की ऊर्जा मांग को आगे बढ़ाएंगे, लेकिन भारत की भूमिका सबसे अहम होगी।

Russia यह समझ चुका है कि अगर उसे लंबे समय तक अपना तेल बाजार मजबूत रखना है, तो भारत के साथ संबंध मजबूत रखना बेहद जरूरी है।

भारत के कारण बदल रही दुनिया की ऊर्जा राजनीति

कुछ साल पहले तक दुनिया का ऊर्जा बाजार पश्चिमी देशों के इर्द-गिर्द घूमता था। अमेरिका और यूरोप तेल की सबसे बड़ी ताकत माने जाते थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

यूरोप तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों और ग्रीन एनर्जी की ओर बढ़ रहा है। चीन की आर्थिक रफ्तार भी पहले जैसी तेज नहीं रही। ऐसे में भारत दुनिया का सबसे बड़ा ग्रोथ इंजन बन गया है।

आज दुनिया की हर बड़ी तेल कंपनी भारत में निवेश करना चाहती है। सऊदी अरब, यूएई, रूस और अमेरिका सभी भारत के ऊर्जा बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं। इसका कारण साफ है—भारत में मांग लगातार बढ़ रही है और आने वाले कई वर्षों तक बढ़ती रहेगी।

भारत के बड़े शहरों में नई रिफाइनरियां बन रही हैं। पेट्रोकेमिकल सेक्टर का विस्तार हो रहा है। गैस पाइपलाइन नेटवर्क बढ़ रहा है। सरकार ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश कर रही है।

क्या भारत तेल पर ज्यादा निर्भर हो रहा है?

यह सवाल अब अक्सर पूछा जा रहा है। क्योंकि दुनिया एक तरफ ग्रीन एनर्जी की तरफ बढ़ रही है, जबकि भारत की तेल खपत लगातार बढ़ रही है।

दरअसल भारत की स्थिति पश्चिमी देशों से अलग है। अमेरिका और यूरोप में ज्यादातर लोगों के पास पहले से वाहन और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। लेकिन भारत अभी विकास के उस दौर में है, जहां करोड़ों लोग पहली बार कार, बाइक और एयर ट्रैवल जैसी सुविधाओं तक पहुंच रहे हैं।

यानी भारत में ऊर्जा की मांग स्वाभाविक रूप से बढ़ रही है। यही वजह है कि इलेक्ट्रिक वाहन और सोलर एनर्जी को बढ़ावा देने के बावजूद तेल की जरूरत खत्म नहीं हो रही।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगले 20 से 25 वर्षों तक भारत में तेल की मांग मजबूत बनी रहेगी। खासकर ट्रांसपोर्ट, एविएशन, इंडस्ट्री और पेट्रोकेमिकल सेक्टर में इसकी भूमिका बहुत बड़ी रहने वाली है।

मध्य पूर्व संकट और भारत की चिंता

दुनिया का सबसे बड़ा तेल संकट हमेशा मध्य पूर्व से जुड़ा रहा है। हाल के महीनों में ईरान और इजराइल के बीच तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी। अगर इस क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं।

भारत के लिए यह चिंता और बड़ी है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। भारत का बड़ा हिस्सा तेल समुद्री रास्तों से आता है, जिनमें होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण है।

अगर इस रास्ते में किसी तरह की रुकावट आती है, तो भारत के लिए तेल महंगा हो सकता है। इसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ेगा। पेट्रोल-डीजल महंगे होंगे, ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ेगा और महंगाई में उछाल आ सकता है।

इसीलिए भारत अब अपने तेल आयात के स्रोतों को विविध बनाने पर जोर दे रहा है। रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से भी तेल खरीद बढ़ाई जा रही है।

Russia से तेल खरीदने में पेमेंट की परेशानी

Russia से तेल खरीदना भारत के लिए फायदे का सौदा साबित हुआ, लेकिन इसके साथ कई चुनौतियां भी सामने आईं। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के कारण भुगतान प्रणाली प्रभावित हुई।

कई भारतीय बैंक Russia से जुड़े लेनदेन को लेकर सतर्क हो गए। डॉलर पेमेंट और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सिस्टम पर अमेरिकी प्रभाव के कारण कई बार भुगतान प्रक्रिया धीमी पड़ गई।

यानी भारत के सामने एक तरफ सस्ता तेल था, तो दूसरी तरफ भुगतान का जोखिम भी था। यही वजह है कि अब भारत और Russia वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था पर काम कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में भारत रुपये में व्यापार बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, ताकि डॉलर पर निर्भरता कम हो।

क्या भारत दुनिया का सबसे बड़ा तेल बाजार बन जाएगा?

अगर मौजूदा रफ्तार जारी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा बाजारों में शामिल हो सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह है देश की युवा आबादी और तेजी से बढ़ता उपभोक्ता वर्ग।

भारत में अभी भी करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो पहली बार आधुनिक ऊर्जा सुविधाओं तक पहुंच रहे हैं। गांवों में गैस कनेक्शन बढ़ रहे हैं। छोटे शहरों में कारों की बिक्री बढ़ रही है। इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बन रहे हैं। एक्सप्रेसवे और हाईवे नेटवर्क तेजी से फैल रहा है।

इन सबका सीधा मतलब है कि तेल की मांग आने वाले समय में और ऊपर जाएगी।

दुनिया भारत को क्यों नहीं कर सकती नजरअंदाज?

आज भारत सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीति का केंद्र बन चुका है। Russia भारत को अपने ऊर्जा भविष्य का सबसे बड़ा साझेदार मान रहा है। सऊदी अरब भारत में निवेश बढ़ा रहा है। अमेरिका भी भारत के साथ ऊर्जा सहयोग मजबूत करना चाहता है।

क्योंकि दुनिया समझ चुकी है कि आने वाले समय में आर्थिक विकास की सबसे बड़ी कहानी भारत लिखने वाला है।

अगर भारत की अर्थव्यवस्था इसी रफ्तार से आगे बढ़ती रही, तो ऊर्जा बाजार में उसकी ताकत और बढ़ेगी। यही वजह है कि वैश्विक तेल कंपनियां अब भारत के साथ लंबे समय की रणनीति बना रही हैं।

भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा है। देश जितना ज्यादा तेल आयात करेगा, उतना ज्यादा वह अंतरराष्ट्रीय बाजार और वैश्विक संकटों पर निर्भर रहेगा।

अगर भविष्य में तेल की कीमतें अचानक बढ़ती हैं, तो भारत की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है। इसलिए सरकार अब वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तेजी से काम कर रही है।

इलेक्ट्रिक वाहन, एथेनॉल, ग्रीन हाइड्रोजन, सोलर और विंड एनर्जी जैसे विकल्पों को तेजी से बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद तेल की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं होने वाली।

भारत को आने वाले वर्षों में एक संतुलन बनाकर चलना होगा—जहां विकास भी जारी रहे और ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत बनी रहे।

निष्कर्ष

Russia के रोसनेफ्ट CEO इगोर सेचिन का बयान यह साफ बताता है कि आने वाले समय में भारत दुनिया की ऊर्जा राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बनने जा रहा है। तेल की दुनिया अब केवल अमेरिका, रूस या चीन के इर्द-गिर्द नहीं घूमेगी, बल्कि भारत उसकी नई धुरी बनने वाला है।

भारत की बढ़ती तेल मांग उसकी आर्थिक ताकत का संकेत है, लेकिन इसके साथ कई बड़ी चुनौतियां भी जुड़ी हैं। ऊर्जा सुरक्षा, आयात निर्भरता और वैश्विक तनाव भारत के लिए भविष्य में बड़ी परीक्षा बन सकते हैं।

फिलहाल इतना तय है कि दुनिया की हर बड़ी तेल कंपनी और हर ऊर्जा महाशक्ति की नजर अब भारत पर है। क्योंकि आने वाले दशक में अगर कोई देश वैश्विक तेल बाजार की दिशा तय करेगा, तो उसमें भारत की भूमिका सबसे अहम रहने वाली है।

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