“Manmohan Singh Death Anniversary | 26 दिसंबर
भारतीय राजनीति में कुछ नेता शोर से पहचाने जाते हैं, तो कुछ अपने फैसलों से। कुछ तालियों के बीच उभरते हैं, तो कुछ इतिहास की किताबों में चुपचाप जगह बना लेते हैं। Dr. Manmohan Singh ऐसे ही नेता थे—जो कम बोले, लेकिन जब बोले तो शब्दों से ज़्यादा असर उनके फैसलों का हुआ।
26 दिसंबर 2024 को भारत ने अपने पूर्व प्रधानमंत्री Dr. Manmohan Singh को खो दिया। उनके जाने के साथ ही एक ऐसा युग समाप्त हो गया, जहां सत्ता का मतलब प्रदर्शन नहीं, बल्कि जिम्मेदारी हुआ करता था। आज उनकी पहली पुण्यतिथि पर देश उन्हें सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं दे रहा, बल्कि यह सवाल भी पूछ रहा है—
क्या सच में वे “कमज़ोर प्रधानमंत्री” थे, या फिर भारत को सबसे मज़बूत नींव देने वाले नेता? taazanews24x7.com

जब प्रधानमंत्री की चुप्पी सवालों के घेरे में आई
Manmohan Singh के प्रधानमंत्री बनने के बाद एक आरोप लगातार दोहराया गया—
“प्रधानमंत्री बोलते नहीं हैं।”
विपक्ष ने उन्हें ‘साइलेंट पीएम’, ‘गूंगा प्रधानमंत्री’ और ‘रिमोट कंट्रोल से चलने वाला नेता’ तक कहा। सोशल मीडिया के दौर से पहले ही उनकी चुप्पी राजनीतिक हथियार बना दी गई थी। हालात इतने बढ़ गए कि एक समय प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) को आधिकारिक आंकड़े जारी करने पड़े।
PMO ने बताया कि—
DR. Manmohan Singh ने अपने दो कार्यकालों में कुल 1198 भाषण दिए।
इनमें संसद में दिए गए भाषण, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संबोधन, नीति संबंधी वक्तव्य और विश्वविद्यालयों में दिए गए व्याख्यान शामिल थे।
लेकिन असली सवाल यह नहीं था कि उन्होंने कितनी बार बोला—
सवाल यह था कि वे कैसे और क्यों बोलते थे।
“हज़ारों जवाबों से बेहतर मेरी ख़ामोशी”
यह पंक्ति मनमोहन सिंह के व्यक्तित्व को सबसे बेहतर तरीके से परिभाषित करती है। वे मानते थे कि—
- हर मुद्दे पर बयान देना ज़रूरी नहीं
- हर आलोचना का जवाब शब्दों में नहीं दिया जाता
- कई बार फैसले ही सबसे मजबूत जवाब होते हैं
उनकी चुप्पी कमजोरी नहीं थी, बल्कि आत्मविश्वास से भरी हुई थी। वे जानते थे कि इतिहास तात्कालिक नारों से नहीं, दीर्घकालिक नीतियों से बनता है।
लोकसभा चुनाव नहीं जीता, फिर भी 10 साल देश चलाया
यह भारतीय लोकतंत्र का एक अनोखा अध्याय है—
- डॉ. मनमोहन सिंह कभी लोकसभा चुनाव नहीं जीते
- वे लगातार राज्यसभा से संसद पहुंचे
- इसके बावजूद उन्होंने 2004 से 2014 तक भारत का नेतृत्व किया
यह उस दौर की राजनीति को दर्शाता है, जब योग्यता, अनुभव और बौद्धिक क्षमता को सत्ता का आधार माना गया। कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाकर यह संदेश दिया कि शासन सिर्फ जनसभाओं से नहीं, बल्कि समझ और दूरदृष्टि से चलता है।
अर्थशास्त्री से प्रधानमंत्री तक का सफर
DR. Manmohan Singh सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, वे पहले अर्थशास्त्री थे—और शायद यही वजह थी कि उनकी सोच राजनीति से कहीं आगे थी।
- जन्म: 1932, अविभाजित भारत
- शिक्षा: कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड
- पद:
- भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर
- योजना आयोग के उपाध्यक्ष
- वित्त मंत्री
- और अंततः प्रधानमंत्री
उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि ज्ञान भी सत्ता चला सकता है।
1991: जब भारत आर्थिक कगार पर खड़ा था
अगर DR. Manmohan Singh का नाम इतिहास में अमर है, तो उसका सबसे बड़ा कारण है—
1991 के आर्थिक सुधार।
उस समय भारत की स्थिति बेहद गंभीर थी—
- विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म
- आयात के लिए सोना गिरवी रखने की नौबत
- अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की साख गिर चुकी थी
ऐसे समय में वित्त मंत्री DR. Manmohan Singh ने वे फैसले लिए, जिनसे भारत की दिशा ही बदल गई—
- लाइसेंस राज का अंत
- निजीकरण की शुरुआत
- विदेशी निवेश के दरवाज़े खुले
- भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाज़ार से जोड़ा गया
आज का उभरता हुआ भारत उसी दौर की नींव पर खड़ा है।
प्रधानमंत्री के रूप में ऐतिहासिक फैसले
1. मनरेगा: गांवों की आर्थिक रीढ़
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम ने करोड़ों ग्रामीण परिवारों को रोज़गार की सुरक्षा दी।
2. RTI: सत्ता से सवाल पूछने का अधिकार
सूचना का अधिकार कानून ने आम नागरिक को सरकार के सामने खड़ा होने की ताकत दी।
3. भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील
इस फैसले ने भारत को वैश्विक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया, भले ही इसके लिए राजनीतिक जोखिम उठाना पड़ा।
4. आर्थिक स्थिरता
2008 की वैश्विक मंदी के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था अपेक्षाकृत स्थिर रही।

“रिमोट कंट्रोल प्रधानमंत्री” का आरोप और हकीकत
यह आरोप लंबे समय तक लगाया गया कि DR. Manmohan Singh पार्टी नेतृत्व के इशारों पर काम करते थे। लेकिन शासन को करीब से देखने वाले जानते हैं कि—
- वे निर्णय प्रक्रिया का केंद्र थे
- असहमति रखने से नहीं हिचकते थे
- लेकिन सार्वजनिक टकराव से बचते थे
उनका नेतृत्व शांत था, मगर कमजोर नहीं।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की बढ़ती साख
मनमोहन सिंह को वैश्विक स्तर पर एक गंभीर और भरोसेमंद नेता के रूप में देखा गया—
- G20
- संयुक्त राष्ट्र
- ASEAN
- BRICS
हर मंच पर भारत की बात सुनी गई, क्योंकि उसे तथ्यों और तर्कों के साथ रखा गया।
निजी जीवन: सादगी की मिसाल
- सत्ता के शिखर पर रहते हुए भी साधारण जीवन
- बिना दिखावे के राजनीति
- कोई व्यक्तिगत घोटाला नहीं
- ईमानदारी पर कभी सवाल नहीं
आज जब राजनीति पर भरोसा डगमगाता है, मनमोहन सिंह का जीवन एक अपवाद की तरह खड़ा दिखता है।
पहली पुण्यतिथि पर कांग्रेस की श्रद्धांजलि
26 दिसंबर को कांग्रेस पार्टी ने देशभर में शोक सभाएं आयोजित कीं। नेताओं ने कहा—
- DR. Manmohan Singh राजनीति में शुचिता का प्रतीक थे
- उन्होंने देश को दिशा दी, न कि सिर्फ सत्ता चलाई
- आज उनकी कमी और ज़्यादा महसूस होती है
एक युग का अंत, लेकिन विरासत अमर
DR. Manmohan Singh हमें यह सिखाते हैं कि—
- हर मजबूत नेता तेज़ आवाज़ वाला नहीं होता
- हर प्रभावशाली प्रधानमंत्री आक्रामक नहीं होता
- और हर ख़ामोशी कमजोरी नहीं होती
उन्होंने इतिहास को शोर से नहीं, सोच से बदला।
निष्कर्ष: इतिहास उन्हें कैसे याद रखेगा?
इतिहास DR. Manmohan Singhको एक ऐसे प्रधानमंत्री के रूप में याद रखेगा—
- जिसने भारत को बदला, बिना खुद को आगे रखे
- जिसने फैसले लिए, बिना नारे लगाए
- जिसने सत्ता को सेवा समझा
और शायद यही वजह है कि
आज भी उनकी ख़ामोशी, कई भाषणों से ज़्यादा गूंजती है।
Remembering Former Prime Minister Dr. Manmohan Singh on his death anniversary — a life of simplicity, honesty, and nation-building that inspires generations. 🙏🏼✨#RememberingDrManmohanSingh#EconomicReforms pic.twitter.com/SFtKg0pyFK
— Tamil Nadu Congress Committee (@INCTamilNadu) December 26, 2025