भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में राष्ट्रपति का पद सबसे सर्वोच्च और सम्मानित संवैधानिक पद माना जाता है। इसलिए जब भी देश के राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर जाते हैं, तो उनके स्वागत और कार्यक्रमों के लिए एक तय Protocol का पालन किया जाता है। लेकिन हाल ही में West Bengal के दौरे के दौरान राष्ट्रपति Droupadi Murmu और राज्य की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के बीच Protocol को लेकर पैदा हुआ विवाद राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा मुद्दा बन गया है।
बताया जा रहा है कि राष्ट्रपति के कोलकाता दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी न तो एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने पहुंचीं और न ही उनके मुख्य कार्यक्रम में शामिल हुईं। इस घटना को लेकर राष्ट्रपति ने खुले मंच से नाराजगी जताई और कहा कि राज्य की मुख्यमंत्री को उनके साथ होना चाहिए था। इसके बाद प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे “शर्मनाक” बताया और कहा कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। taazanews24x7.com
इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर राष्ट्रपति का प्रोटोकॉल क्या होता है, इसे क्यों इतना महत्वपूर्ण माना जाता है और इस मामले का राजनीतिक और संवैधानिक महत्व क्या है।

राष्ट्रपति का पद क्यों है सबसे अहम
भारत में राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक माने जाते हैं। यह पद केवल औपचारिक नहीं बल्कि संवैधानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है। राष्ट्रपति देश के तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर होते हैं और कई महत्वपूर्ण संवैधानिक शक्तियों के धारक भी होते हैं।
संविधान के अनुसार केंद्र सरकार राष्ट्रपति के नाम से काम करती है। संसद द्वारा पारित हर विधेयक को कानून बनने से पहले राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है। इसके अलावा प्रधानमंत्री, राज्यपाल और कई अन्य संवैधानिक पदों की नियुक्ति भी राष्ट्रपति के माध्यम से होती है।
इसी कारण जब राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर जाते हैं तो पूरे प्रशासन के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण कार्यक्रम माना जाता है।
क्या होता है राष्ट्रपति का Protocol?
राष्ट्रपति के दौरे के दौरान जो औपचारिक प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं, उन्हें ही राष्ट्रपति Protocol कहा जाता है। यह Protocol भारत सरकार के गृह मंत्रालय और Protocol विभाग द्वारा तय किया जाता है।
जब राष्ट्रपति किसी राज्य में पहुंचते हैं तो सामान्य तौर पर निम्नलिखित व्यवस्थाएं की जाती हैं:
- राज्यपाल द्वारा आधिकारिक स्वागत
- मुख्यमंत्री या उनके प्रतिनिधि की मौजूदगी
- एयरपोर्ट पर सम्मान गार्ड
- प्रशासनिक अधिकारियों की उपस्थिति
- कार्यक्रमों में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों की भागीदारी
इन सभी प्रक्रियाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का पूरा सम्मान किया जाए।
West Bengal दौरे में क्या हुआ?
राष्ट्रपति Droupadi Murmu शनिवार को पश्चिम बंगाल के दौरे पर पहुंचीं। उनके कार्यक्रम में कई महत्वपूर्ण आयोजन शामिल थे, जिनमें शैक्षणिक संस्थानों के कार्यक्रम और सामाजिक समारोह भी शामिल थे।
लेकिन विवाद तब खड़ा हो गया जब मुख्यमंत्री Mamata Banerjee न तो एयरपोर्ट पर राष्ट्रपति का स्वागत करने पहुंचीं और न ही उनके मुख्य कार्यक्रम में दिखाई दीं। बताया गया कि राज्य सरकार की ओर से कुछ अधिकारियों और प्रतिनिधियों ने कार्यक्रम में भाग लिया, लेकिन मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति को लेकर सवाल उठने लगे।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में इस बात का जिक्र करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री उनके साथ कार्यक्रम में मौजूद रहेंगी।
उनका यह बयान सामने आते ही यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया।

पीएम मोदी की प्रतिक्रिया
इस पूरे विवाद पर प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर हैं और उनका सम्मान करना हर राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।
प्रधानमंत्री ने इस घटना को “शर्मनाक” बताते हुए कहा कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसी स्थिति पहले बहुत कम देखने को मिली है।
उनकी टिप्पणी के बाद राजनीतिक माहौल और गर्म हो गया।
राष्ट्रपति की नाराजगी क्यों खास मानी जाती है
भारत में राष्ट्रपति आम तौर पर सार्वजनिक मंचों पर राजनीतिक विवादों से दूरी बनाए रखते हैं। वे अक्सर तटस्थ भूमिका में रहते हैं और किसी भी राज्य सरकार या नेता पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से बचते हैं।
ऐसे में अगर राष्ट्रपति किसी कार्यक्रम में नाराजगी जाहिर करते हैं तो इसे असाधारण घटना माना जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला केवल व्यक्तिगत असहमति का नहीं बल्कि संवैधानिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है।
राज्य सरकार का पक्ष
West Bengal सरकार की ओर से इस विवाद पर अलग-अलग स्पष्टीकरण सामने आए हैं। कुछ सूत्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री पहले से निर्धारित कार्यक्रमों में व्यस्त थीं, इसलिए वे राष्ट्रपति के स्वागत के लिए नहीं पहुंच सकीं।
राज्य सरकार का यह भी कहना है कि प्रशासनिक अधिकारियों ने राष्ट्रपति के कार्यक्रम के लिए सभी जरूरी व्यवस्थाएं की थीं।
हालांकि विपक्ष का कहना है कि मुख्यमंत्री को अपने कार्यक्रम बदलकर राष्ट्रपति के कार्यक्रम में शामिल होना चाहिए था।
विपक्ष का हमला
इस मामले को लेकर विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री पर तीखा हमला बोला है। उनका कहना है कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन संवैधानिक पदों का सम्मान सबसे ऊपर होना चाहिए।
विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।

क्या यह केवल Protocol का मामला है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद केवल Protocol का मामला नहीं बल्कि केंद्र और राज्य के बीच राजनीतिक संबंधों को भी दर्शाता है।
West Bengal की राजनीति में पिछले कई वर्षों से केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव देखने को मिलता रहा है। कई मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच राजनीतिक मतभेद खुले तौर पर सामने आए हैं।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस घटना को उसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में भी देखा जा सकता है।
केंद्र-राज्य संबंधों की चुनौती
भारत एक संघीय व्यवस्था वाला देश है, जहां केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। अगर संवैधानिक कार्यक्रमों में भी राजनीतिक विवाद पैदा होने लगें तो इससे संस्थाओं के बीच भरोसे पर असर पड़ सकता है।
इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों को संवेदनशीलता और जिम्मेदारी के साथ संभालना चाहिए।
पहले भी हुए हैं ऐसे विवाद
भारतीय राजनीति में Protocol को लेकर विवाद पहले भी सामने आते रहे हैं। कई बार नेताओं की अनुपस्थिति या देरी को लेकर राजनीतिक बयानबाजी देखने को मिली है।
हालांकि राष्ट्रपति से जुड़े मामलों में ऐसा विवाद बहुत कम देखने को मिलता है। इसलिए Bengal की यह घटना काफी चर्चा में है।
जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया और आम लोगों के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा हो रही है। कुछ लोग इसे Protocol का उल्लंघन मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे राजनीतिक विवाद के रूप में देख रहे हैं।
कई लोगों का मानना है कि लोकतंत्र में संवैधानिक पदों का सम्मान बनाए रखना बेहद जरूरी है।
निष्कर्ष
West Bengal में राष्ट्रपति के दौरे के दौरान पैदा हुआ यह विवाद भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे चुका है। राष्ट्रपति Droupadi Murmu की नाराजगी और प्रधानमंत्री Narendra Modi की प्रतिक्रिया ने इस मुद्दे को और अधिक चर्चा में ला दिया है।
यह मामला केवल एक कार्यक्रम या Protocol तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र में संस्थाओं के सम्मान और राजनीतिक मर्यादाओं से भी जुड़ा हुआ है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस विवाद का राजनीतिक असर क्या होता है और क्या इससे केंद्र और राज्य के संबंधों पर कोई प्रभाव पड़ता है।
Mamata Banerjee’s Bengal has a pattern now, First, a minister like Akhil Giri insults the President Droupadi Murmu Ji, and now her govt allegedly blocks permission for an event where the President was the Chief Guest.
— Keshav Soni (@ImKeshavSoni) March 7, 2026
This isn’t politics anymore. It’s blatant disrespect to the… pic.twitter.com/Mg6dp4we2i