MGNREGA विवाद: ममता बनर्जी का केंद्र पर तीखा हमला, बंगाल की जॉब स्कीम को महात्मा गांधी के नाम से जोड़ने का बड़ा और सियासी ऐलान

कोलकाता : देश की सबसे महत्वाकांक्षी और जन-जीवन से सीधे जुड़ी ग्रामीण रोजगार योजना MGNREGA (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम) एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। इस बार विवाद मजदूरी भुगतान, भ्रष्टाचार या काम के दिनों को लेकर नहीं, बल्कि सीधे तौर पर महात्मा गांधी के नाम से जुड़ा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए साफ कर दिया है कि अगर केंद्र गांधी जी के नाम को हटाने या कमजोर करने की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो बंगाल न केवल उसका विरोध करेगा बल्कि अपनी राज्य स्तरीय रोजगार योजना को महात्मा गांधी के नाम से जोड़कर एक राजनीतिक और वैचारिक संदेश भी देगाtaazanews24x7.com

ममता बनर्जी का यह ऐलान केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे केंद्र बनाम राज्य, विचारधारा बनाम शासन और प्रतीक बनाम नीति की बड़ी लड़ाई के तौर पर देखा जा रहा है।

MGNREGA: एक योजना नहीं, ग्रामीण भारत की रीढ़

MGNREGA की शुरुआत वर्ष 2005 में हुई थी। इसका उद्देश्य था ग्रामीण भारत में रहने वाले गरीब और मजदूर परिवारों को उनके गांव में ही काम देकर रोजगार की कानूनी गारंटी प्रदान करना। यह योजना इसलिए ऐतिहासिक मानी गई क्योंकि इसमें पहली बार सरकार ने रोजगार को अधिकार के रूप में मान्यता दी।

इस योजना के तहत:

  • हर ग्रामीण परिवार को साल में 100 दिन का रोजगार
  • समय पर मजदूरी भुगतान का अधिकार
  • महिलाओं, दलितों और वंचित वर्गों को प्राथमिकता
    जैसे प्रावधान शामिल किए गए।

MGNREGA का नाम महात्मा गांधी के नाम पर इसलिए रखा गया क्योंकि यह योजना उनके ग्राम-स्वराज, श्रम की गरिमा और आत्मनिर्भरता जैसे सिद्धांतों से प्रेरित थी।

नाम बदलने की चर्चा और विवाद की शुरुआत

हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए एक नए विधायी प्रस्ताव और कुछ प्रशासनिक दस्तावेजों में MGNREGA के नाम से ‘महात्मा गांधी’ शब्द हटाने के संकेत मिले। सरकार का तर्क है कि योजना के ढांचे में बदलाव और विस्तार के कारण नया नाम दिया जा रहा है।

लेकिन विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि यह केवल नाम बदलने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और वैचारिक पहचान को कमजोर करने की रणनीति है।

यहीं से यह मुद्दा राजनीतिक बहस से आगे बढ़कर राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन गया।

ममता बनर्जी का आक्रामक रुख: “गांधी इस देश की आत्मा हैं”

कोलकाता में एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बेहद तीखे शब्दों में केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा—

“महात्मा गांधी कोई साधारण नाम नहीं हैं। वह इस देश की आत्मा हैं। अगर कोई उनकी पहचान मिटाना चाहता है, तो बंगाल उसे कभी स्वीकार नहीं करेगा।”

ममता बनर्जी ने आगे कहा कि:

  • गांधी जी का नाम हटाना राष्ट्रीय मूल्यों के खिलाफ है
  • यह फैसला गरीब और मजदूर वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाता है
  • बंगाल गांधीवादी परंपरा से समझौता नहीं करेगा

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हम भिखारी नहीं हैं”, हमें न तो पैसे की भीख चाहिए और न ही सम्मान की।

कर्मश्री योजना: केंद्र से टकराव के बीच राज्य का विकल्प

MGNREGA को लेकर पश्चिम बंगाल और केंद्र सरकार के बीच पिछले कुछ वर्षों से फंड विवाद चल रहा है। राज्य सरकार का आरोप है कि:

  • हजारों करोड़ रुपये का भुगतान लंबित है
  • मजदूरों को महीनों से मजदूरी नहीं मिली
  • राजनीतिक कारणों से फंड रोका गया

इसी परिस्थिति से निपटने के लिए बंगाल सरकार ने कर्मश्री’ नाम से राज्य स्तरीय रोजगार योजना शुरू की। इसका मकसद था कि ग्रामीण मजदूर पूरी तरह केंद्र सरकार पर निर्भर न रहें।

  1. केंद्र से फंड को लेकर चल रहे टकराव के बीच पश्चिम बंगाल सरकार ने कर्मश्री योजना को ग्रामीण मजदूरों के लिए एक व्यावहारिक सहारा बनाया। इस योजना के तहत गांवों में सीमित अवधि के लिए काम उपलब्ध कराया गया, ताकि मजदूरों को रोज़गार के लिए बाहर न जाना पड़े। मजदूरी का भुगतान सीधे राज्य सरकार के बजट से किया गया, जबकि कामों की पहचान और निगरानी की जिम्मेदारी पंचायतों को सौंपी गई, जिससे स्थानीय जरूरतों के हिसाब से काम तय हो सके।
  2. कर्मश्री योजना को महात्मा गांधी के नाम से जोड़ने के फैसले को सिर्फ नाम बदलने के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ कर दिया है कि यह कदम उस सोच के खिलाफ एक राजनीतिक जवाब है, जो राष्ट्रीय रोजगार योजना से गांधी जी का नाम हटाने की दिशा में बढ़ रही है। उनके मुताबिक, यह फैसला बंगाल की गांधीवादी परंपरा और वैचारिक प्रतिबद्धता को दोहराता है और उन ग्रामीण मजदूरों को सम्मान और पहचान देता है, जिनके लिए रोजगार आत्मसम्मान से जुड़ा मुद्दा है।
  3. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस फैसले से ममता बनर्जी खुद को गांधीवादी मूल्यों की सबसे मुखर आवाज के रूप में पेश कर रही हैं, खासकर ऐसे समय में जब रोजगार योजनाएं सिर्फ नीतिगत नहीं, बल्कि वैचारिक बहस का विषय बन चुकी हैं।
  4. MGNREGA को लेकर केंद्र और बंगाल के बीच टकराव अब केवल पैसे या भुगतान तक सीमित नहीं रह गया है। एक ओर लंबित फंड और मजदूरी का सवाल है, तो दूसरी ओर योजना की पहचान और अधिकार को लेकर भी जंग छिड़ चुकी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह विवाद अब केंद्र-राज्य संबंधों की असली परीक्षा बन गया है।
  5. वैचारिक टकराव – नाम और पहचान

केंद्र सरकार का कहना है कि भुगतान रोकने के पीछे अनियमितताओं की जांच है, जबकि बंगाल सरकार इसे राजनीतिक प्रतिशोध बता रही है।

नाम बदलने का मुद्दा इस टकराव को और गहरा कर गया है।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: समर्थन और विरोध दोनों तेज

कांग्रेस, वाम दल और कई क्षेत्रीय पार्टियों ने ममता बनर्जी के फैसले का समर्थन किया है। विपक्ष का कहना है:

  • गांधी का नाम हटाना अनावश्यक है
  • इससे योजना की आत्मा कमजोर होती है
  • यह केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि वैचारिक हमला है

वहीं भाजपा नेताओं का तर्क है कि:

  • नाम से ज्यादा जरूरी काम है
  • ममता बनर्जी राजनीति कर रही हैं
  • राज्य सरकार अपनी विफलताओं से ध्यान भटका रही है

ग्रामीण मजदूरों की आवाज: भावनाएं और जरूरतें

ग्रामीण इलाकों में मजदूरों की राय साफ तौर पर बंटी हुई नजर आती है।

कुछ मजदूर कहते हैं—

“नाम से पेट नहीं भरता, पैसा समय पर मिले यही जरूरी है।”

जबकि अन्य मजदूरों का कहना है—

“गांधी जी का नाम हमें सम्मान देता है, इससे भरोसा बनता है।”

यह साफ है कि यह विवाद भावनात्मक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर असर डाल रहा है

गांधी और रोजगार: ऐतिहासिक और वैचारिक संबंध

महात्मा गांधी का मानना था कि:

  • गांव भारत की आत्मा हैं
  • श्रम सबसे बड़ा धर्म है
  • आत्मनिर्भरता ही सच्ची आजादी है

MGNREGA जैसी योजना इन विचारों को जमीन पर उतारने का प्रयास थी। इसलिए गांधी का नाम हटाना कई लोगों को वैचारिक विचलन लगता है।

चुनावी राजनीति में असर: 2026 की ओर नजर

राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह मुद्दा आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में:

  • ग्रामीण वोट बैंक
  • मजदूर वर्ग
  • सामाजिक न्याय के सवाल
    को प्रभावित कर सकता है।

ममता बनर्जी इस मुद्दे के जरिए खुद को केंद्र के खिलाफ मजबूत संघीय आवाज के रूप में पेश कर रही हैं।

नीति विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञों के अनुसार:

  • नाम बदलना प्रतीकात्मक जरूर है, लेकिन असर गहरा होता है
  • रोजगार योजनाएं भरोसे और निरंतरता पर चलती हैं
  • केंद्र-राज्य टकराव का सीधा नुकसान गरीबों को होता है

क्या समाधान संभव है?

विशेषज्ञों का मानना है कि:

  • केंद्र और राज्य के बीच संवाद जरूरी है
  • राजनीति से ऊपर उठकर मजदूरों के हित देखे जाने चाहिए
  • योजनाओं का उद्देश्य नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है, लेकिन नाम की भी अपनी अहमियत है

निष्कर्ष: सिर्फ योजना नहीं, विचारधारा की जंग

MGNREGA विवाद अब केवल एक सरकारी योजना का मामला नहीं रह गया है। यह:

  • पहचान की लड़ाई
  • विचारधारा का टकराव
  • संघीय ढांचे की परीक्षा
    बन चुका है।

ममता बनर्जी द्वारा बंगाल की जॉब स्कीम को महात्मा गांधी के नाम से जोड़ने का फैसला इस बहस को और तेज करेगा। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार अपने फैसले पर पुनर्विचार करती है या यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में और गहराता है।

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