नई दिल्ली।
भारतीय संसद के इतिहास में कुछ दिन ऐसे होते हैं, जो सिर्फ कार्यवाही के लिए नहीं बल्कि लोकतंत्र की दिशा और दशा तय करने के लिए याद रखे जाते हैं। बजट सत्र का वह दिन भी ऐसा ही बन गया, जब Lok Sabha स्पीकर ओम बिरला ने सदन में यह स्वीकार किया कि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से Lok Sabha में न आने का आग्रह किया था, क्योंकि स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती थी। taazanews24x7.com
यह बयान सिर्फ एक प्रशासनिक जानकारी नहीं थी, बल्कि इसके पीछे छिपे संकेतों ने पूरे देश की राजनीति में भूचाल ला दिया। सवाल यह नहीं रह गया कि प्रधानमंत्री क्यों नहीं आए, बल्कि यह बन गया कि क्या संसद के भीतर प्रधानमंत्री की सुरक्षा खतरे में थी?

क्या था पूरा मामला?
बजट सत्र के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा चल रही थी। परंपरा के अनुसार, इस चर्चा का जवाब प्रधानमंत्री स्वयं LOK SABHA में देते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी Lok Sabha में उपस्थित नहीं हुए, और प्रस्ताव को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।
यह फैसला इसलिए ऐतिहासिक बन गया क्योंकि पिछले 22 वर्षों में ऐसा पहली बार हुआ, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री के भाषण के बिना पारित हुआ।
शुरुआत में इसे विपक्ष के हंगामे से जोड़कर देखा गया, लेकिन बाद में जो कारण सामने आए, वे कहीं ज्यादा गंभीर थे।
स्पीकर ओम बिरला का बड़ा बयान
Lok Sabha स्पीकर ओम बिरला ने सदन में कहा—
“मुझे सूचना मिली थी कि विपक्ष के कुछ सांसद प्रधानमंत्री की सीट तक पहुंच सकते हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी अप्रत्याशित घटना घट सकती थी। इसलिए मैंने प्रधानमंत्री से आग्रह किया कि वे सदन में न आएं।”
स्पीकर का यह बयान संसदीय इतिहास में बेहद दुर्लभ माना जा रहा है। आमतौर पर स्पीकर सदन की कार्यवाही तक सीमित रहते हैं, लेकिन सुरक्षा को लेकर इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणी यह दर्शाती है कि स्थिति कितनी गंभीर थी।
Very big news : Loksabha speaker Om Birla confirmed that Congress was planning a physical attack against PM Modi on Rahul Gandhi’s orders..
— Mr Sinha (@Mrsinha) February 5, 2026
This is serious… Very serious…. Modi gvt shouldn't tolerate this….
pic.twitter.com/mKidvuL0yg
प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने की कोशिश?
भाजपा और संसदीय सूत्रों का दावा है कि विपक्ष के कुछ सांसद प्रधानमंत्री की सीट की ओर बढ़ने की तैयारी में थे। बताया गया कि हंगामे की आड़ में कुछ सांसद आगे बढ़ सकते थे, जिससे सुरक्षा व्यवस्था को गंभीर चुनौती मिलती।
सूत्रों के अनुसार, Lok Sabha सचिवालय और सुरक्षा एजेंसियों को पहले से इनपुट मिला था कि—
- सदन में हंगामा सामान्य विरोध तक सीमित नहीं रहेगा
- कुछ सांसद मर्यादा की सीमा लांघ सकते हैं
- प्रधानमंत्री की शारीरिक सुरक्षा को खतरा हो सकता है
इन्हीं इनपुट्स के आधार पर प्रधानमंत्री को सदन में न बुलाने का निर्णय लिया गया।
22 साल में पहली बार बदली परंपरा
संसदीय परंपराओं में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह वह अवसर होता है, जब प्रधानमंत्री सरकार की दिशा, नीतियों और प्राथमिकताओं पर जवाब देते हैं।
लेकिन इस बार सुरक्षा कारणों से यह परंपरा टूट गई। विशेषज्ञों के अनुसार, यह सिर्फ एक तकनीकी फैसला नहीं था, बल्कि यह दिखाता है कि संसद के भीतर भरोसे का स्तर कितना गिर चुका है।
भाजपा का आरोप: “प्रधानमंत्री पर हमले की साजिश”
इस घटनाक्रम के बाद भाजपा ने कांग्रेस पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। पार्टी नेताओं का कहना है कि—
- कांग्रेस सांसदों की योजना प्रधानमंत्री की कुर्सी के पास पहुंचने की थी
- स्थिति को अराजक बनाकर दबाव बनाया जा रहा था
- महिला सांसदों को आगे रखकर सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की जा सकती थी
भाजपा नेताओं ने इसे लोकतंत्र पर सीधा हमला करार दिया और कहा कि यह सिर्फ प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि देश के संवैधानिक पद पर हमला होता।
Lok Sabha सचिवालय का पक्ष
Lok Sabha सचिवालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सुरक्षा इनपुट को हल्के में नहीं लिया जा सकता था। संसद के भीतर किसी भी तरह की अप्रत्याशित घटना न केवल देश की छवि को नुकसान पहुंचाती, बल्कि लोकतंत्र की नींव को भी हिला सकती थी।
सूत्रों के मुताबिक—
- सुरक्षा एजेंसियां पूरी तरह अलर्ट पर थीं
- स्थिति पल-पल बदल रही थी
- जोखिम का आकलन करके ही निर्णय लिया गया
PM MODI : "Even the wealthiest nations deport illegal immigrants, yet in our country, courts are being pressured to protect them" pic.twitter.com/s1vGA9Xeuh
— News Algebra (@NewsAlgebraIND) February 5, 2026
प्रधानमंत्री मोदी का जवाब: कांग्रेस पर तीखा हमला
राज्यसभा में अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने LOK SABHA की घटना पर कांग्रेस को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा—
“यह सिर्फ मेरा अपमान नहीं है। यह संसद, लोकतंत्र और देश के सर्वोच्च पद का अपमान है।”
प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि जिन लोगों को राष्ट्रपति के अभिभाषण से समस्या है, वे संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान नहीं करते।
उन्होंने विशेष रूप से यह भी कहा कि आदिवासी समाज से आने वाले राष्ट्रपति के सम्मान से जुड़ा मुद्दा भी इसमें शामिल है।
कांग्रेस का पलटवार: “डर का माहौल बनाया जा रहा”
कांग्रेस ने भाजपा और स्पीकर के बयानों को सिरे से खारिज कर दिया। पार्टी नेताओं का कहना है कि—
- विपक्ष लोकतांत्रिक तरीके से विरोध कर रहा था
- किसी तरह की हिंसा या हमले की योजना का आरोप झूठा है
- सरकार बहस से बचने के लिए सुरक्षा का बहाना बना रही है
कांग्रेस का कहना है कि प्रधानमंत्री LOK SABHA में आकर जवाब देने से बच रहे थे और अब आरोपों के जरिए ध्यान भटकाया जा रहा है।
संसद की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने संसद की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए—
- अगर खतरा इतना गंभीर था, तो सांसदों को रोका क्यों नहीं गया?
- सदन के भीतर अनुशासन बनाए रखने की जिम्मेदारी किसकी है?
- क्या भविष्य में प्रधानमंत्री को बार-बार सुरक्षा कारणों से सदन से दूर रखा जाएगा?
पूर्व LOK SABHA अधिकारियों का कहना है कि संसद में ऐसा माहौल लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है।
राजनीतिक विश्लेषण: टकराव की राजनीति चरम पर
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, यह घटना सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ते अविश्वास का प्रतीक है। संवाद की जगह टकराव ने ले ली है।
विश्लेषकों का मानना है कि—
- संसद अब बहस का मंच कम और संघर्ष का मैदान ज्यादा बनती जा रही है
- मर्यादा टूटने से लोकतांत्रिक संस्थाएं कमजोर होती हैं
- आने वाले समय में ऐसे हालात दोहराए जा सकते हैं
क्या खतरे में है संसदीय लोकतंत्र?
जब प्रधानमंत्री को सुरक्षा कारणों से LOK SABHA में आने से रोका जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संसदीय लोकतंत्र कितना सुरक्षित है।
लोकतंत्र की आत्मा संवाद में होती है। अगर संवाद की जगह अविश्वास और टकराव ले ले, तो उसका असर सिर्फ राजनीति पर नहीं, बल्कि पूरे देश पर पड़ता है।
भविष्य के लिए चेतावनी
यह घटना आने वाले समय के लिए एक चेतावनी भी है—
- राजनीतिक दलों को संयम दिखाना होगा
- संसद की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है
- सुरक्षा और लोकतंत्र के बीच संतुलन जरूरी है
अगर संसद में ही असुरक्षा का माहौल बन गया, तो आम जनता में क्या संदेश जाएगा?
निष्कर्ष: एक दिन, जो इतिहास बन गया
LOK SABHA में प्रधानमंत्री का न आना सिर्फ एक घटनाक्रम नहीं था। यह—
- संसद की बदली हुई सियासत का संकेत था
- लोकतंत्र की परीक्षा की घड़ी थी
- और राजनीतिक मर्यादाओं पर गंभीर सवाल था
सच चाहे जो भी हो, लेकिन यह साफ है कि यह मामला लंबे समय तक भारतीय राजनीति की दिशा तय करने वाली बहस बना रहेगा।