कोलकाता/नई दिल्ली।
देश की राजनीति में चुनावी रणनीति, सत्ता और जांच एजेंसियों के रिश्ते पर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। कारण बना है Indian Political Action Committee (I-PAC) से जुड़े ठिकानों पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) की छापेमारी। इस कार्रवाई में I-PAC के चीफ और सह-संस्थापक PRATIK JAIN के आवास पर की गई तलाशी ने न सिर्फ राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी, बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति को भी उबाल पर ला दिया। taazanews24x7.com
मामला उस वक्त और गंभीर हो गया, जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद I-PAC संस्थापक के घर पहुंचीं और ED पर सीधा आरोप लगाया कि एजेंसी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) से जुड़े पार्टी दस्तावेज जब्त किए हैं। ममता बनर्जी के इस कदम को राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है, जिसने इस जांच को महज कानूनी कार्रवाई से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय राजनीतिक टकराव का रूप दे दिया है।
ED की छापेमारी: अचानक कार्रवाई या लंबी जांच का नतीजा?
ED के अधिकारियों के अनुसार, यह छापेमारी किसी एक दिन में लिया गया फैसला नहीं थी, बल्कि यह पश्चिम बंगाल में अवैध कोयला तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले की लंबी जांच का हिस्सा है। एजेंसी का दावा है कि उसके पास ऐसे इनपुट थे, जिनसे यह संदेह पैदा हुआ कि अवैध कोयला कारोबार से अर्जित धन का इस्तेमाल राजनीतिक गतिविधियों और चुनावी रणनीति से जुड़ी सेवाओं में किया गया।
ED सूत्रों के मुताबिक छापेमारी के दौरान:
- कई डिजिटल डिवाइस (लैपटॉप, हार्ड डिस्क, मोबाइल)
- बैंक और लेनदेन से जुड़े कागजात
- कुछ ई-मेल और डेटा एनालिसिस रिपोर्ट्स
- और चुनावी अभियानों से संबंधित दस्तावेज
जब्त किए गए।
हालांकि एजेंसी ने अभी तक किसी भी व्यक्ति को औपचारिक रूप से आरोपी घोषित नहीं किया है, लेकिन यह जरूर कहा है कि जांच मनी ट्रेल और डिजिटल सबूतों पर केंद्रित है।
PRATIK JAIN: चुनावी राजनीति का ‘बैक-एंड मास्टरमाइंड’
PRATIK JAIN उन नामों में शुमार हैं, जिन्होंने भारतीय राजनीति में चुनावी रणनीति को पूरी तरह बदल दिया। वे न तो मंच पर भाषण देने वाले नेता हैं और न ही मीडिया में अक्सर दिखने वाला चेहरा, लेकिन राजनीतिक गलियारों में उन्हें रणनीति का दिमाग माना जाता है।
I-PAC के जरिए PRATIK JAIN ने:
- डेटा-आधारित चुनावी मॉडल
- बूथ-स्तरीय माइक्रो प्लानिंग
- मतदाताओं के व्यवहार का विश्लेषण
- सोशल मीडिया और ग्राउंड कैंपेन का संयोजन
जैसी आधुनिक तकनीकों को भारतीय चुनावों में लोकप्रिय बनाया।
उनका नाम पहली बार किसी जांच एजेंसी की हाई-प्रोफाइल रेड में आने से राजनीतिक रणनीति कंपनियों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।

I-PAC क्या है और यह कैसे काम करता है?
Indian Political Action Committee (I-PAC) की स्थापना 2013 में हुई थी। शुरुआत में इसका उद्देश्य चुनावों में पारदर्शी और पेशेवर रणनीति उपलब्ध कराना बताया गया। I-PAC खुद को एक पॉलिटिकल कंसल्टिंग फर्म मानता है, जो किसी भी पार्टी की विचारधारा से ऊपर रहकर तकनीकी और रणनीतिक सहयोग देता है।
I-PAC का काम मुख्य रूप से:
- वोटर डेटा कलेक्शन
- फीडबैक और सर्वे
- चुनावी नैरेटिव तैयार करना
- डिजिटल कैंपेन मैनेजमेंट
- और पॉलिसी इनपुट देना
रहा है।
लेकिन आलोचकों का मानना है कि बीते कुछ वर्षों में I-PAC की भूमिका सलाहकार से आगे बढ़कर प्रभावशाली राजनीतिक खिलाड़ी जैसी हो गई है।
TMC और I-PAC: पेशेवर समझौता या रणनीतिक साझेदारी?
पश्चिम बंगाल में 2021 विधानसभा चुनाव को भारतीय राजनीति के सबसे अहम चुनावों में गिना जाता है। उस चुनाव में भाजपा की आक्रामक चुनौती के बावजूद TMC की शानदार जीत के पीछे I-PAC की रणनीति को एक बड़ा कारण माना गया।
“Didi Ke Bolo”, “Banglar Gorbo Mamata” जैसे अभियानों ने:
- ममता बनर्जी की छवि को
- स्थानीय मुद्दों के साथ जोड़कर
- वोटरों तक सीधा संदेश पहुंचाया
इस पूरे चुनावी प्रबंधन में I-PAC की भूमिका इतनी गहरी थी कि कई TMC नेताओं ने सार्वजनिक रूप से इसका जिक्र किया।
यही वजह है कि जब ED ने I-PAC पर छापा मारा, तो TMC ने इसे पार्टी पर परोक्ष हमला करार दिया।
ममता बनर्जी का हस्तक्षेप: भावनात्मक समर्थन या राजनीतिक रणनीति?
ED की छापेमारी की खबर मिलते ही ममता बनर्जी का खुद मौके पर पहुंचना असामान्य राजनीतिक घटनाक्रम माना जा रहा है। उन्होंने मीडिया से कहा:
“यह कार्रवाई लोकतंत्र को डराने की कोशिश है। चुनाव से पहले विपक्ष को कमजोर करने के लिए एजेंसियों का इस्तेमाल किया जा रहा है।”
ममता बनर्जी ने यह भी दावा किया कि:
- ED ने TMC से जुड़े कागजात उठाए
- जो पार्टी के संगठनात्मक कामकाज से संबंधित थे
इस बयान के बाद सवाल उठने लगे कि क्या I-PAC और TMC के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो चुकी है कि जांच सीधे पार्टी तक पहुंच रही है?

ED का तर्क: कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग कनेक्शन
ED का कहना है कि यह मामला पश्चिम बंगाल के अवैध कोयला तस्करी नेटवर्क से जुड़ा है, जिसकी जांच पहले से चल रही है। इस नेटवर्क में:
- कोयला खदानों से अवैध निकासी
- सीमा पार तस्करी
- और राजनीतिक संरक्षण के आरोप
लगातार सामने आते रहे हैं।
एजेंसी को संदेह है कि:
- इस अवैध कमाई का एक हिस्सा
- चुनावी अभियानों और रणनीतिक सेवाओं में
- परोक्ष रूप से लगाया गया
हालांकि ED ने यह स्पष्ट किया है कि जांच का दायरा अभी खुला है और किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
राजनीतिक प्रतिक्रिया: BJP बनाम विपक्ष
इस पूरे मामले पर राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं भी तीखी रही हैं।
BJP नेताओं का कहना है कि:
- जांच एजेंसियां कानून के तहत काम कर रही हैं
- अगर कुछ छिपाने को नहीं है, तो डरने की जरूरत नहीं
वहीं TMC और विपक्षी दलों का आरोप है कि:
- केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल
- विपक्ष को दबाने के लिए किया जा रहा है
- और चुनाव से पहले डर का माहौल बनाया जा रहा है
यह बहस अब संसद से लेकर सड़कों तक पहुंच चुकी है।
क्या यह मामला चुनावी रणनीति उद्योग को प्रभावित करेगा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल I-PAC तक सीमित नहीं रहेगा। इससे:
- चुनावी सलाहकार कंपनियों की फंडिंग
- राजनीतिक दलों से उनके अनुबंध
- और उनकी कानूनी जवाबदेही
पर व्यापक बहस शुरू हो सकती है।
अगर जांच आगे बढ़ती है, तो भविष्य में चुनावी रणनीति फर्मों पर नए नियम और निगरानी की मांग तेज हो सकती है।
लोकतंत्र, जांच एजेंसियां और भरोसे का सवाल
इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया है कि:
- क्या जांच एजेंसियां पूरी तरह स्वतंत्र हैं?
- या फिर राजनीतिक दबाव में काम कर रही हैं?
साथ ही यह भी कि:
- क्या राजनीतिक दलों और रणनीतिक सलाहकारों के रिश्तों में
- पर्याप्त पारदर्शिता है?
ये सवाल आने वाले समय में भारतीय लोकतंत्र की दिशा तय करने में अहम साबित हो सकते हैं।

निष्कर्ष: सिर्फ छापेमारी नहीं, एक बड़ा राजनीतिक संकेत
I-PAC पर ED की छापेमारी, PRATIK JAIN के घर रेड और ममता बनर्जी का खुला समर्थन — ये सभी घटनाएं संकेत देती हैं कि मामला केवल कानूनी जांच नहीं, बल्कि सत्ता, रणनीति और विश्वास की लड़ाई बन चुका है।
अब देखना यह होगा कि:
- ED की जांच किन नतीजों तक पहुंचती है
- क्या कोई ठोस सबूत सामने आते हैं
- या यह मामला भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह जाता है
लेकिन इतना तय है कि इस प्रकरण ने भारतीय चुनावी राजनीति के पर्दे के पीछे की दुनिया को पहली बार आम जनता के सामने ला दिया है।
FAQ:
Q1. I-PAC क्या है?
I-PAC (Indian Political Action Committee) एक चुनावी रणनीति और राजनीतिक परामर्श देने वाली संस्था है, जो राजनीतिक दलों को डेटा एनालिसिस, ग्राउंड कैंपेन और डिजिटल रणनीति में मदद करती है।
Q2. ED ने I-PAC पर छापेमारी क्यों की?
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने I-PAC से जुड़े ठिकानों पर छापेमारी पश्चिम बंगाल के अवैध कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच के तहत की है।
Q3. PRATIK JAIN कौन हैं?
PRATIK JAIN I-PAC के सह-संस्थापक और प्रमुख रणनीतिकार हैं। उन्हें भारतीय चुनावी राजनीति में डेटा-ड्रिवन कैंपेनिंग का प्रमुख चेहरा माना जाता है।
Q3. ममता बनर्जी I-PAC संस्थापक के घर क्यों पहुंचीं?
ममता बनर्जी ने ED की कार्रवाई को राजनीतिक बदले की भावना से प्रेरित बताते हुए PRATIK JAIN के घर पहुंचकर विरोध दर्ज कराया और दावा किया कि पार्टी से जुड़े दस्तावेज जब्त किए गए हैं।
Q4. TMC और I-PAC का क्या संबंध है?
TMC और I-PAC के बीच 2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में रणनीतिक साझेदारी रही है। कई चुनावी अभियानों में I-PAC ने TMC के लिए काम किया है।
Q5. क्या I-PAC पर कोई आरोप तय हुआ है?
फिलहाल ED की जांच जारी है। अभी तक I-PAC या PRATIK JAIN के खिलाफ कोई औपचारिक आरोप या गिरफ्तारी नहीं हुई है।
Q6. कोयला तस्करी मामला क्या है? यह मामला पश्चिम बंगाल में अवैध कोयला खनन और तस्करी से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग नेटवर्क से संबंधित है, जिसकी जांच ED और अन्य एजेंसियां कर रही हैं।

🎥 | “You have crossed all limits,” said West Bengal CM #MamataBanerjee after ED raids on #PrashantKishor-founded I-PAC in #Kolkata, accusing the Centre of targeting TMC’s IT arm. The ED denied the charge, linking the action to a coal smuggling probe. #IPAC #EDRaid #WestBengal… pic.twitter.com/5FXTFHS4Na
— The Statesman (@TheStatesmanLtd) January 8, 2026