बिहार चुनाव 2025: बिहार की राजनीति एक बार फिर उबाल पर है। वर्ष 2025 का विधानसभा चुनाव राज्य की दिशा और दशा तय करने वाला साबित हो सकता है। राजनीतिक गलियारों से लेकर गाँव की चौपालों तक, हर जगह यही चर्चा है कि इस बार “कौन बाज़ी मारेगा?”
जहाँ एक ओर NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) अपनी पकड़ मज़बूत करने की कोशिश में जुटा है, वहीं महागठबंधन जनता से जुड़ने के लिए नए अभियान चला रहा है। इस बार मुद्दे सिर्फ जाति या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और कानून व्यवस्था जैसे विषय केंद्र में हैं। बिहार चुनाव 2025 की राजनीतिक हलचल तेज़ हो गई है। नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव और भाजपा की रणनीतियाँ नए समीकरण बना रही हैं।taazanews24x7.com
क्यों महत्वपूर्ण है बिहार?
बिहार जनसंख्या, सामाजिक विविधता और राजनीतिक महत्व के कारण हमेशा से चर्चित रहा है। यहाँ की विधानसभा में कुल 243 सीटें हैं, और इस बार की 18वीं विधानसभा के लिए यह मुकाबला अहम था।
राज्य में विकास-चुनौतियाँ, युवा बेरोजगारी, प्रवासी कामगारों की समस्या जैसे सामाजिक-आर्थिक मुद्दे प्रमुख हैं।
राष्ट्रीय राजनीति के परिप्रेक्ष्य में, भारतीय जनता पार्टी-नेता नरेंद्र मोदी के लिए यह चुनाव एक परीक्षा-पटल था — कि क्या उनके नेतृत्व में इसकी गठबंधन रणनीति (एनडीए) उत्तर भारत के राज्यों में फिर-से मजबूत हो सकती है।
इसके अलावा, मतदाता संसाधनों, चुनावी रोल्स-सुधार तथा मतदान प्रक्रिया में तकनीकी पहलुओं ने इसे इतिहास में खास बना दिया है।
चुनाव कार्यक्रम और मतदान प्रक्रिया
इस बार का चुनाव द्वि-चरणीय था। पहले चरण में 6 नवंबर 2025 को 121 सीटों पर मतदान हुआ, दूसरे चरण में 11 नवंबर 2025 को बचे 122 सीटों पर।
मतगणना की तिथि 14 नवंबर 2025 नियत की गई है।
Election Commission of India (ECI) ने बताया कि दोनों चरणों के बाद शून्य री-पोलिंग (re-polling) की सिफारिश हुई है — जो कि राज्य के चुनाव इतिहास में एक अनोखा रिकॉर्ड है।
मतदान उत्साह व रिकॉर्ड-मतदाता भागीदारी
इस चुनाव में वोटर टर्नआउट का प्रतिशत काफी ऊँचा रहा। कुल मिलाकर लगभग 67.14% मतदान हुआ।
पहले चरण में 65.08%, दूसरे में लगभग 69% तक पहुंच।
महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही — महिलाओं ने लगभग 71.6% मतदान किया, पुरुषों ने 62.8%।
ऐसी बड़ी हिस्सेदारी यह संकेत देती है कि मतदाता-सक्रियता बढ़ी है, और यह राजनीतिक दलों के लिए चेतावनी-संकट का भी संकेत हो सकता है।
पार्टियों-गठबंधनों का समीकरण
एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन)
प्रमुख सदस्य हैं: भाजपा (BJP) व जनता दल (यूनाइटेड) (JDU)।
सीट-साझेदारी में भाजपा व जे डी(U) ने लगभग 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ने का समझौता किया था।
गठबंधन ने विकास, सुरक्षा व सामाजिक कल्याण के एजेंडे को बढ़ावा दिया।
महागठबंधन / इंडिया-ब्लॉक
प्रमुख रूप से राष्ट्रीय जनता दल (RJD), कांग्रेस व अन्य सहयोगी शामिल।
RJD ने “एक-परिवार एक नौकरी” जैसे वादों के साथ मिथकीय विशेषकर सामाजिक-न्याय पर ज़ोर दिया।
तीसरा मोर्चा / नए खेल-खिलाड़ी
- जन सुराज पार्टी (Prashant Kishor द्वारा) जैसे नए दल भी मैदान में हैं, लेकिन अभी तक सीमित प्रभाव दिखा रहे हैं।
प्रमुख चुनावी मुद्दे
- बेरोजगारी व प्रवासन: बिहार में युवा बेरोजगारी एक बड़ी समस्या बनी हुई है, और कई युवक-युवतियाँ रोजगार की तलाश में बाहर जाते हैं।
- चुनावी रोल-रिविज़न & मतदाता सूची: ECI के नामांकन-सुधार (Special Intensive Revision) अभियान में 52 लाख से अधिक मतदाता अपने पते पर नहीं पाए गए। यह विवाद का विषय रहा।
- सुरक्षा-विधान व चुनावी प्रक्रिया: ECI ने सैकड़ों केंद्रीय पर्यवेक्षकों की तैनाती की ताकि चुनाव निष्पक्ष हों।
- मंडल-वर्ग व जातिगत समीकरण: बिहार की राजनीति में आज भी जाति-वर्ग आधारित समीकरण अहम भूमिका निभाते हैं।
- महिला मतदाता: इस बार महिलाओं की भागीदारी जितनी बढ़ी है, वह राजनीतिक दलों को नए विमर्श के लिए बाध्य करती है।
सर्वे-नतीजे व अनुमान
- सर्वेक्षण व एग्ज़िट-पोल्स ने अधिकांशतः एनडीए को बढ़त दी है, लेकिन कुछ ने इसे छूटा-कटा मुकाबला बताया।
- उदाहरण के लिए, एग्जिट-पोल कंपनी Axis My India ने एनडीए को 121-141 सीटें मिलने की संभावना जताई, जबकि RJD-महागठबंधन को 98-118 सीटें मिलने का अनुमान।
- मतदान बढ़ने के बावजूद, इतिहास-रुझानों के अनुसार जब वोटर-टर्नआउट में 5 % से अधिक की बढ़ोतरी होती है, तब सत्ता-परिवर्तन की संभावना बढ़ जाती है।
विश्लेषण: क्या संकेत मिल रहे हैं?
- रिकॉर्ड-उच्च मतदान और महिला-मतदान में बढ़ोतरी यह दर्शाती है कि मतदाता-उत्साह अधिक था। यह सिर्फ “पहचानें वोट” नहीं बल्कि सक्रिय निर्णय-वोटिंग का संकेत हो सकता है।
- हालांकि, उच्च मतदान हमेशा सत्ता-परिवर्तन का गारंटीकामी नहीं है — लेकिन पूर्व अनुभव दिखाते हैं कि जब मतदान में उल्लेखनीय वृद्धि होती है, तब पुरानी सरकारों पर चुनौतियां बढ़ जाती हैं।
- एनडीए के लिए यह चुनाव टेस्ट है — क्या वह उत्तर भारत में अपनी पैठ कायम रख पाएगा? दूसरी ओर, महागठबंधन के लिए यह मौका है — क्या वह सामाजिक न्याय-वर्गीय एजेंडा से वोट हासिल कर पाएगा?
- तीसरे मोर्चे का असर अभी सीमित दिख रहा है, लेकिन यदि उसने कुछ क्षेत्रीय सीटें छीन लीं, तो परिणाम प्रभावित हो सकते हैं।
- मतदाता सूची विवाद व रोल-रिविज़न खासी चर्चा में रहा। इससे “मतदाता वामन” (voter disenfranchisement) जैसी चिंताएँ उभरी हैं।
- सोशल मीडिया का बढ़ता असर
- बिहार की नई राजनीति में सोशल मीडिया एक बड़ा हथियार बन गया है।
राजनीतिक दल अब ट्विटर (एक्स), इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर एक्टिव कैंपेन चला रहे हैं।
भाजपा “मोदी मिशन बिहार” नामक डिजिटल अभियान चला रही है, वहीं राजद ने “लालू का बिहार – जनता का बिहार” टैगलाइन के साथ डिजिटल आंदोलन छेड़ रखा है। - कांग्रेस और छोटे दल भी टिकटॉक, शॉर्ट्स और रील्स के माध्यम से युवाओं तक पहुँचने की कोशिश कर रहे हैं।
चुनौतियाँ व आगे का रास्ता
- प्रवासी मतदाता: बिहार से बाहर कामगारों का आंकड़ा बड़ी संख्या में है। उनकी वोटिंग प्रभावित हुई या नहीं, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
- युवा-मतदाता: रोजगार, भविष्य-आशा इन युवाओं के लिए चुनाव का मूल मुद्दा रहा। इनका मनो-मिजाज़ चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
- वोट-रोल्स की विश्वसनीयता: यदि मतदाता सूची में गड़बड़ी का आरोप सच साबित होता है, तो इस पर राजनीतिक दलों व न्यायालयों में विवाद हो सकता है।
- निर्णय-तंत्र व निर्वाहनीय वादे: सामाजिक कल्याण व नौकरी-वादा जैसी घोषणाएँ जमीनी-हकीकत से जब मेल नहीं खातीं, तो विरोधी दल इसका लाभ उठा सकते हैं।
- नई राजनीतिक धाराएँ: राजनीति में पारंपरिक मोर्चेबंदी के अतिरिक्त नए-दल या नये गेमचेंजर उभर रहे हैं, जिसपर आगे ध्यान देना होगा।
निष्कर्ष
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव ने संकेत दिए हैं कि राजनीति-परिदृश्य ठहरा हुआ नहीं है। विकास- वाद, सामाजिक-न्याय, जातिगत समीकरण, मतदाता-सक्रियता — ये सब मिलकर एक जटिल तस्वीर पेश कर रहे हैं।
यदि एनडीए इस चुनाव में सफल रहा, तो यह उत्तर भारत में उसकी स्थिति को मजबूत करेगा। लेकिन दूसरी ओर, यदि महागठबंधन ने कील हिला दी, तो राजनीतिक दलों के लिए “वोट बैंक” की परिभाषाएँ पुनः आकार ले सकती हैं।
सुझाव के रूप में
मतदाता: यदि आप मतदाता हैं, तो यह सुनिश्चित करें कि आपका नाम मतदाता-सूची में हो क्योंकि इस बार सूची-सुधार चर्चा में रहा है।
राजनीति-रोचक: राजनीतिक समीकरण को सिर्फ सीट-मंजूरी में मत देखें; उम्मीदवारों की छवि, स्थानीय विकास, वादों का क्रियान्वयन महत्वपूर्ण होगा।
पेपर-पढ़ने वालों को: इस चुनाव को सिर्फ परिणाम-द्वारा नहीं बल्कि लंबी-पारी की राजनीति के हिस्से के रूप में देखें।
प्रतियोगी दलों को: यह एक चेतावनी भी हो सकती है कि चुनाव में सिर्फ वोट बैंक नहीं चलता; सक्रिय समाचार-परिधि, मतदाताओं की जागरूकता और सामाजिक-मीडिया प्रभाव भी निर्णायक होता जा रहा है।
बिहार चुनाव 2025 हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र सिर्फ मतदान तक सीमित नहीं है — यह विस्तार और गहराई दोनों में निरंतर विकसित हो रहा है।
Sheohar, Bihar Chunav : लोग वास्तव में क्या चाहते हैं ? pic.twitter.com/p9dcJoNYGe
— News18 Jharkhand (@News18Jharkhand) November 8, 2025