प्रस्तावना
वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ: “वंदे मातरम” यह सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि पुकार है भारत के आत्मा की। यही वह गीत है जिसने स्वंत्रता सेनानिनियो के दिलो में में जोश, साहस और बलिदान की भावना जगाई थी। पूरा देश आज वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है, यह केवल एक गीत का नहीं बल्कि भारत की अस्मिता, संस्कृति और राष्ट्रीय गर्व के प्रतीक का उत्सव है। taazanews24x7.com
7 नवंबर 1875 को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम की रचना की थी और इसे अपनी प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ जो की अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ संघर्षरत साधु-संतों की कहानी तथा जिसमें “वंदे मातरम्” भारत माता की आराधना का प्रतीक बनकर उभरा था, में 1862 को प्रकाशित किया गया था।
भारत देश जब अंग्रेजो के द्वारा ग़ुलामी की ज़ंजीरो में जकड़ा था तब बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित यह गीत वंदे मातरम ने देश के लोगो को यह एहसास कराया की भारत केवल एक टुकड़ा नहीं, बल्कि माँ है देवी है जिसकी रक्षा करना हर भारतीय का प्रथम कर्तव्य एवं धर्म है।
“वंदे मातरम्” को संस्कृत और बंगला भाषा के मिश्रण में लिखा गया है। इसके पहले दो पद राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किए गए हैं।
यहाँ उसके मूल शब्द हैं —
वन्दे मातरम्!
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्।
शुभ्रज्योत्स्नापुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम्॥
इन शब्दों में भारत के प्राकृतिक सौंदर्य, उसकी मातृसुलभ करुणा और उसकी महानता का अद्भुत वर्णन है। हर पंक्ति में मातृभूमि के प्रति प्रेम, श्रद्धा और समर्पण झलकता है।
🇮🇳 स्वतंत्रता संग्राम में “वंदे मातरम्” का प्रभाव
भारत का स्वतंत्रता संग्राम जब तेज़ हुआ, तब “वंदे मातरम्” आंदोलन का नारा बन गया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब जनता सड़कों पर उतरी, तो “वंदे मातरम्” हर दिशा में गूंज उठा।
यही नारा स्वदेशी आंदोलन, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन तक पहुँच गया।
महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, भगत सिंह, नेताजी सुभाषचंद्र बोस — सभी इस गीत से प्रभावित थे। नेताजी ने तो अपने इंडियन नेशनल आर्मी (INA) के अभिवादन के रूप में “वंदे मातरम्” को अपनाया था।
“वंदे मातरम्” गाने पर ब्रिटिश सरकार ने कई जगह पाबंदी लगा दी थी, क्योंकि यह नारा हर बार जनजागरण और विद्रोह की चिनगारी भड़काता था। लेकिन जनता ने इसे कभी नहीं छोड़ा। स्कूलों, मंदिरों, रैलियों और अखाड़ों में “वंदे मातरम्” का स्वर गूंजता रहा।
150 साल की यात्रा: वंदे मातरम् से आज तक
1875 से 2025 तक — यानी 150 वर्षों की यात्रा में “वंदे मातरम्” ने भारत के हर युग को छुआ है।
1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब “वंदे मातरम्” को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया।
राष्ट्रीय ध्वज फहराने के साथ-साथ यह गीत हर समारोह में गाया जाने लगा।
भारत के संविधान सभा ने भी 24 जनवरी 1950 को “वंदे मातरम्” को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया।
यह वह गीत है जो हर भारतीय के दिल में देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित करता है।
वंदे मातरम् की धुन और संगीत
इस गीत को कई प्रसिद्ध संगीतकारों ने अपनी धुनों में सजाया है।
सबसे प्रसिद्ध संगीत संस्करण रवीन्द्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में प्रस्तुत किया था।
इसके बाद ए.आर. रहमान ने 1997 में “वंदे मातरम्” को आधुनिक रूप देकर दुनिया के सामने रखा। उनका संस्करण आज भी युवाओं के बीच देशभक्ति का प्रतीक माना जाता है।
आज के समय में भी कई कलाकार — लता मंगेशकर, सोनू निगम, हरिहरण, और शंकर महादेवन — ने इस गीत को अपनी आवाज़ दी है।
150वीं वर्षगांठ: देशभर में हो रहा भव्य आयोजन
दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रगीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में एक साल के राष्ट्रव्यापी समारोह का आरम्भ हुआ। यह समारोह 7 नवंबर 2025 से 7 नवंबर 2026 तक चलेगा। प्रधानमंत्री ने इस दिन को ऐतिहासिक बनाने के लिएएक विशेष स्मारक डाक टिकट और 150 रुपये का सिक्का जारी किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में वंदे मातरम को आत्मविश्वास को बढ़ने वाला और नए हौसले का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि यह गीत भारत की सांस्कृतिक पहचान, स्वतंत्रता आंदोलन को प्रेरित करने वाला और शाश्वत संकल्पना का एक अमर मंत्र है।
2025 में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर पूरे भारत में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
- नई दिल्ली में लाल किले से लेकर इंडिया गेट तक “वंदे मातरम् मार्च” निकाला जा रहा है।
- कोलकाता, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की कर्मभूमि, में एक विशेष सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया गया है।
- विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में निबंध, भाषण और गायन प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं।
- प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति भी इस अवसर पर राष्ट्र को संबोधित कर रहे हैं और इस गीत के ऐतिहासिक महत्व को याद कर रहे हैं।
आधुनिक भारत में वंदे मातरम् का महत्व
आज जब भारत “विकसित राष्ट्र” बनने की दिशा में अग्रसर है, तब “वंदे मातरम्” का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है।
यह गीत हमें याद दिलाता है कि देशभक्ति केवल झंडा लहराने तक सीमित नहीं, बल्कि देश की प्रगति, एकता और भाईचारे के लिए कार्य करने में है।
“वंदे मातरम्” आज भी भारत के युवाओं के लिए प्रेरणा है। चाहे वह रक्षा सेवाएं हों, विज्ञान हो, खेल हो या स्टार्टअप संस्कृति, हर क्षेत्र में मातृभूमि के प्रति समर्पण ही भारत को आगे बढ़ा रहा है।
विवाद और समाधान
कभी-कभी “वंदे मातरम्” को लेकर धार्मिक विवाद भी उठे हैं। कुछ समुदायों ने इसे “पूजा” के रूप में देखने से परहेज़ किया।
लेकिन भारत के संविधान निर्माताओं ने इसे एक राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में स्वीकार किया, किसी धर्म से ऊपर रखकर।
आज यह गीत किसी धर्म विशेष का नहीं बल्कि पूरे भारत राष्ट्र का गीत है — जो हर भारतीय की पहचान है।
वैश्विक मंच पर भारत का गौरव
आज जब भारत दुनिया के मंच पर अपनी पहचान स्थापित कर रहा है, तब “वंदे मातरम्” विदेशों में बसे भारतीयों के लिए भी गर्व का प्रतीक बन गया है।
विदेशों में आयोजित भारतीय स्वतंत्रता दिवस समारोहों में यह गीत गूंजता है, और लोगों की आंखें नम हो जाती हैं।
यह गीत न केवल भारत की धरती पर, बल्कि हर उस दिल में जीवित है जो भारत को प्यार करता है।
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का योगदान
“वंदे मातरम्” के रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय केवल कवि नहीं, बल्कि भारत के पहले साहित्यिक राष्ट्रवादी भी थे।
उन्होंने कलम के माध्यम से जो क्रांति शुरू की, उसने तलवारों को भी मात दे दी।
उनकी लेखनी ने भारत को एक विचार दिया — “मां भारत की सेवा ही सच्चा धर्म है।”
शिक्षा और संस्कृति में वंदे मातरम् की भूमिका
आज भी भारतीय शिक्षा संस्थानों में “वंदे मातरम्” गाया जाता है।
यह गीत विद्यार्थियों को अपने देश, संस्कृति और पर्यावरण से जुड़ने की प्रेरणा देता है।
कला, संगीत, और नृत्य के क्षेत्र में भी इस गीत का प्रयोग देशभक्ति थीम पर आधारित प्रस्तुतियों में किया जाता है।
निष्कर्ष
“वंदे मातरम्” केवल गीत नहीं — यह भारत की आत्मा है, यह देश की संस्कृति की जड़ है।
150 वर्षों बाद भी इसकी गूंज उतनी ही जीवंत है जितनी स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में थी।
हर बार जब कोई भारतीय “वंदे मातरम्” कहता है, तो वह न केवल अपनी मातृभूमि का सम्मान करता है बल्कि यह भी स्वीकार करता है कि भारत माता की सेवा ही सर्वोच्च धर्म है।
2025 की यह 150वीं वर्षगांठ हमें यह स्मरण कराती है कि हम उस पीढ़ी के वारिस हैं जिसने इस गीत के स्वर से स्वतंत्रता की ज्योति जलाई थी।
और अब हमारी जिम्मेदारी है — इस गीत के अर्थ को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि कर्म में उतारना।