बिहार की जमीन व्यवस्था अब पुराने ढर्रे पर नहीं चलेगी
बिहार में जमीन से जुड़े विवाद केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक चुनौती रहे हैं। वर्षों से दाखिल-खारिज (Mutation) की प्रक्रिया आम नागरिक के लिए सिरदर्द बनी हुई थी। जमीन खरीदने के बाद नाम चढ़वाने में महीनों नहीं, बल्कि कई-कई साल लग जाते थे। अंचल कार्यालयों के चक्कर, फाइलों पर आपत्तियां, और बिचौलियों का बोलबाला—यही बिहार की जमीन व्यवस्था की पहचान बन चुकी थी। taazanews24x7.com
अब राज्य सरकार ने इस पूरी व्यवस्था को बदलने का मन बना लिया है। Bihar Bhumi Portal, राजस्व अधिकारियों की जवाबदेही, सरकारी भूमि की सुरक्षा, लोक शिकायत सुनवाई और Farmer Registry Bihar—इन सभी मोर्चों पर एक साथ कार्रवाई शुरू की गई है। राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव से लेकर उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा तक, हर स्तर से एक ही संदेश दिया गया है—
अब लापरवाही, देरी और मनमानी नहीं चलेगी।

दाखिल-खारिज में सुस्ती पर विभागीय सचिव का सख्त लेटर
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव ने हाल ही में बिहार के सभी जिलों के कलेक्टरों (DM) को एक कड़ा पत्र जारी किया है। इस पत्र में दाखिल-खारिज मामलों में हो रही देरी पर गहरी नाराजगी जताई गई है।
पत्र में साफ लिखा गया है कि—
- बड़ी संख्या में दाखिल-खारिज आवेदन तय समयसीमा के बावजूद लंबित हैं
- कई अंचलों में वर्षों पुराने मामले अब भी निपटाए नहीं गए
- इससे आम जनता में सरकार और प्रशासन के प्रति अविश्वास बढ़ रहा है
कलेक्टरों को दिए गए स्पष्ट निर्देश
- जिलेवार लंबित मामलों की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जाए
- हर सप्ताह समीक्षा बैठक अनिवार्य हो
- देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान की जाए
- जरूरत पड़ने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए
यह लेटर इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि इसमें पहली बार जवाबदेही की जिम्मेदारी सीधे जिला प्रशासन पर डाली गई है।
CO की मनमानी पर रोक: अब तय समय में निपटारा होगा अनिवार्य
दाखिल-खारिज को लेकर सबसे ज्यादा शिकायतें अंचल अधिकारियों (CO) के खिलाफ आती रही हैं। आम लोगों का आरोप रहा है कि—
- बिना ठोस कारण आपत्ति लगा दी जाती है
- फाइलें जानबूझकर रोकी जाती हैं
- रिश्वत या सिफारिश के बिना काम नहीं होता
इन आरोपों को गंभीरता से लेते हुए सरकार ने साफ कर दिया है—
“दाखिल-खारिज आवेदनों पर अब CO की मनमानी नहीं चलेगी।”
नए नियम क्या कहते हैं?
- हर आवेदन की डिजिटल एंट्री और टाइम-स्टैम्पिंग
- तय समयसीमा में फैसला अनिवार्य
- बिना लिखित कारण आवेदन रोकना गैरकानूनी
- देरी होने पर जवाबदेही सीधे CO की
अब दाखिल-खारिज सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि ट्रैक होने वाला प्रशासनिक काम बन चुका है।
सरकारी भूमि के दाखिल-खारिज में ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति
उपमुख्यमंत्री एवं राजस्व मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने सरकारी भूमि को लेकर सबसे सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने साफ कहा—
“सरकारी भूमि के दाखिल-खारिज में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
सरकारी जमीन क्यों है सबसे बड़ा मुद्दा?
- हजारों एकड़ जमीन पर अवैध कब्जा
- फर्जी दस्तावेजों के जरिए निजी नाम दर्ज
- स्कूल, अस्पताल और सड़क की जमीन पर अतिक्रमण
- भू-माफिया और भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत
सरकार की नई रणनीति
- सरकारी भूमि के सभी दाखिल-खारिज मामलों की विशेष जांच
- संदिग्ध म्यूटेशन को दोबारा सत्यापित करना
- दोषी पाए जाने पर FIR और विभागीय कार्रवाई
- अवैध कब्जों को हटाने की समयबद्ध योजना
सरकार का मानना है कि सरकारी जमीन पर सख्ती ही भू-माफिया की कमर तोड़ सकती है।
अब सप्ताह में दो दिन अनिवार्य लोक शिकायत सुनवाई
आम जनता की सबसे बड़ी शिकायत यही रही है कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है। इसी को बदलने के लिए सरकार ने बड़ा फैसला लिया है।

अब सभी राजस्व अधिकारी सप्ताह में कम से कम दो दिन अनिवार्य रूप से लोक शिकायत सुनेंगे।
इस फैसले का महत्व
- आम नागरिक की सीधी सुनवाई
- बिचौलियों की भूमिका खत्म
- शिकायतों का त्वरित समाधान
- प्रशासनिक पारदर्शिता में बढ़ोतरी
किन अधिकारियों पर लागू होगा नियम?
- अंचल अधिकारी (CO)
- भूमि सुधार उपसमाहर्ता (DCLR)
- अनुमंडलीय अधिकारी (SDO)
अब कोई भी अधिकारी यह नहीं कह सकेगा कि उसे जनता की शिकायत सुनने का समय नहीं है।
मार्च तक भू-माफिया का हिसाब: डिप्टी सीएम की सख्त डेडलाइन
बिहार में भू-माफिया का नेटवर्क वर्षों से सक्रिय रहा है। शहरों में बहुमंजिला इमारतें हों या गांवों में खेत-खलिहान—हर जगह अवैध कब्जे की शिकायतें मिलती रही हैं।
डिप्टी सीएम विजय सिन्हा ने स्पष्ट कहा—
“बिहार में सक्रिय भू-माफिया का मार्च तक हिसाब हो जाएगा।”
भू-माफिया के खिलाफ एक्शन प्लान
- जिला स्तर पर विशेष टास्क फोर्स
- पुलिस, प्रशासन और राजस्व विभाग की संयुक्त कार्रवाई
- भू-माफिया की डिजिटल प्रोफाइलिंग
- अवैध कब्जों की सूची बनाकर निष्कासन
सरकार का मानना है कि जब रिकॉर्ड दुरुस्त होंगे, तभी भू-माफिया पर स्थायी लगाम लग सकेगी।
Farmer Registry Bihar: किसानों के लिए बड़ा सिस्टम रिफॉर्म
सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि किसानों की पहचान और अधिकार भी सरकार की प्राथमिकता में है। इसी उद्देश्य से Farmer Registry Bihar को तेज करने के निर्देश दिए गए हैं।
सरकार का बड़ा कदम
- वरिष्ठ अधिकारियों की जिलों में तैनाती
- फील्ड लेवल सत्यापन
- फर्जी किसानों की पहचान
- वास्तविक किसानों को योजनाओं का लाभ
Farmer Registry क्यों जरूरी है?
- पीएम-किसान योजना
- फसल बीमा
- कृषि सब्सिडी
- MSP और कृषि नीतियां
सरकार चाहती है कि कोई भी असली किसान वंचित न रहे और फर्जीवाड़ा पूरी तरह खत्म हो।
Bihar Bhumi Portal: डिजिटल सुधार की रीढ़
Bihar Bhumi Portal ने जमीन से जुड़े कई काम ऑनलाइन कर दिए हैं, लेकिन चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं।
मौजूदा समस्याएं
- तकनीकी खामियां
- सर्वर स्लो होने की शिकायत
- ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल जानकारी की कमी
सरकार की तैयारी
- पोर्टल का तकनीकी अपग्रेड
- मोबाइल-फ्रेंडली इंटरफेस
- CSC के जरिए सहायता
- कर्मचारियों और नागरिकों के लिए प्रशिक्षण
विशेषज्ञों की राय: जमीन विवादों में आएगी ऐतिहासिक कमी
भूमि सुधार विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ये फैसले जमीन पर उतरे तो—
- जमीन विवादों में 40–50% तक कमी आ सकती है
- अदालतों पर बोझ घटेगा
- निवेश और विकास को बढ़ावा मिलेगा
- ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी

निष्कर्ष: बिहार की जमीन व्यवस्था में नए युग की शुरुआत
बिहार सरकार का यह कदम केवल दाखिल-खारिज तेज करने तक सीमित नहीं है। यह—
- भू-माफिया पर सीधा हमला
- राजस्व तंत्र की सफाई
- किसानों और आम नागरिक को अधिकार
- पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन
की दिशा में एक समग्र सुधार अभियान है।
अब असली परीक्षा जमीनी स्तर पर होगी। लेकिन इतना तय है कि Bihar Bhumi, दाखिल-खारिज और राजस्व व्यवस्था अब पहले जैसी नहीं रहने वाली।