24 घंटे में 27 Solar Storms: सूरज बना ‘ज्वालाओं की फैक्ट्री’, क्या धरती पर छाएगा अंधेरा?

Flights, सैटेलाइट, GPS और रेडियो सिस्टम पर मंडरा रहा खतरा, ISRO ने दी चेतावनी

धरती से करीब 15 करोड़ किलोमीटर दूर स्थित सूरज इन दिनों असामान्य रूप से उग्र व्यवहार कर रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, बीते 24 घंटों में सूरज से 27 सौर तूफान (Solar Storms) दर्ज किए गए हैं, जिनमें से कई अत्यंत शक्तिशाली सोलर फ्लेयर (Solar Flare) और कोरोनल मास इजेक्शन (CME) के रूप में सामने आए। इस अचानक आई सौर गतिविधि ने पूरी दुनिया के वैज्ञानिक समुदाय, अंतरिक्ष एजेंसियों और सैटेलाइट ऑपरेटिंग कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है।

खासतौर पर भारत के लिए यह स्थिति इसलिए भी संवेदनशील मानी जा रही है क्योंकि ISRO ने संभावित ‘रेडियो ब्लैकआउट’ और GPS सिस्टम में गड़बड़ी को लेकर चेतावनी जारी की है। सवाल उठ रहा है—क्या सूरज का यह ‘गुस्सा’ धरती पर बड़े संकट की दस्तक है? taaza news24x7.com

Solar Storms and Solar Flare

सूरज पर क्या हो रहा है? क्यों अचानक इतने सौर तूफान?

सूरज की सतह पर इन दिनों कई विशाल सनस्पॉट (Sunspots) सक्रिय हैं। ये सनस्पॉट दरअसल सूरज के वे क्षेत्र होते हैं जहां चुंबकीय क्षेत्र बेहद अस्थिर हो जाता है। जब इन क्षेत्रों में अचानक चुंबकीय ऊर्जा का विस्फोट होता है, तो उससे निकलती हैं सौर ज्वालाएं।सूर्य पर बने विशाल सनस्पॉट 4366 से वैज्ञानिक सतर्क हो गए हैं. तेज सौर ज्वालाओं के कारण धरती पर ऑरोरा और तकनीकी दिक्कतों की आशंका जताई जा रही है.सूर्य पर बना एक बहुत बड़ा और खतरनाक सनस्पॉट इन दिनों वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रहा है. इस सनस्पॉट को रीजन 4366 नाम दिया गया है. बीते दो दिनों में इसने कई तेज सौर ज्वालाएं छोड़ी हैं, जिनमें हाल के वर्षों की सबसे शक्तिशाली ज्वालाएं भी शामिल हैं ।

वैज्ञानिकों के अनुसार:

  • पिछले 24 घंटों में
    • 17 बड़े सोलर फ्लेयर
    • 10 मध्यम स्तर के सौर विस्फोट
      दर्ज किए गए
  • इनमें से कुछ विस्फोट X-क्लास और M-क्लास फ्लेयर की श्रेणी में आते हैं, जिन्हें बेहद खतरनाक माना जाता है

NASA और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ESA के सैटेलाइट्स लगातार सूरज की निगरानी कर रहे हैं और उन्होंने पुष्टि की है कि यह गतिविधि Solar Cycle 25 के चरम (Peak) की ओर इशारा करती है।

सौर तूफान क्या होते हैं? सरल शब्दों में समझिए

सौर तूफान तब बनते हैं जब सूरज से निकलने वाली अत्यधिक ऊर्जा, प्लाज्मा और चार्ज्ड कण तेज़ गति से अंतरिक्ष में फैलते हैं। अगर इनका रुख पृथ्वी की ओर होता है, तो ये पृथ्वी के मैग्नेटोस्फीयर (Magnetosphere) से टकराते हैं।

इसके परिणाम हो सकते हैं:

  • रेडियो सिग्नल फेल
  • GPS नेविगेशन में गड़बड़ी
  • सैटेलाइट्स का अस्थायी या स्थायी नुकसान
  • फ्लाइट रूट में बदलाव
  • पावर ग्रिड पर दबाव

Flights पर सीधा असर: हवाई यातायात क्यों खतरे में?

सौर तूफानों का सबसे पहला असर हाई-फ्रीक्वेंसी रेडियो कम्युनिकेशन पर पड़ता है, जिसका इस्तेमाल लंबी दूरी की अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में होता है, खासकर:

  • ध्रुवीय क्षेत्रों (Polar Routes) से गुजरने वाली फ्लाइट्स
  • ट्रांस-अटलांटिक और ट्रांस-पैसिफिक रूट

विशेषज्ञों का कहना है कि:

  • पायलट्स को रेडियो सिग्नल टूटने की समस्या हो सकती है
  • फ्लाइट्स को वैकल्पिक मार्ग अपनाने पड़ सकते हैं
  • ईंधन खर्च और यात्रा समय बढ़ सकता है

इसी वजह से कई एयरलाइंस ने अपने ऑपरेशन सेंटर को हाई अलर्ट पर रखा है।

सैटेलाइट और GPS सिस्टम पर कितना बड़ा खतरा?

आज की दुनिया सैटेलाइट्स पर निर्भर है—मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट, टीवी, मौसम पूर्वानुमान, रक्षा संचार, बैंकिंग सिस्टम—सब कुछ।

सौर तूफानों से:

  • सैटेलाइट्स के इलेक्ट्रॉनिक सर्किट जल सकते हैं
  • GPS की सटीकता घट सकती है
  • मोबाइल लोकेशन में कई मीटर तक की त्रुटि आ सकती है

ISRO के वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत के NavIC सिस्टम पर भी अस्थायी प्रभाव पड़ सकता है, हालांकि फिलहाल कोई स्थायी नुकसान नहीं हुआ है।

रेडियो ब्लैकआउट’ क्या है? ISRO ने क्यों दी चेतावनी?

रेडियो ब्लैकआउट वह स्थिति होती है जब सौर ज्वालाओं से निकली तीव्र एक्स-रे किरणें पृथ्वी के आयनमंडल (Ionosphere) को प्रभावित करती हैं। इससे:

  • AM/FM रेडियो सिग्नल पूरी तरह बंद हो सकते हैं
  • एयर ट्रैफिक कंट्रोल से संपर्क टूट सकता है
  • समुद्री संचार प्रणाली प्रभावित हो सकती है

ISRO ने चेताया है कि यदि आने वाले दिनों में और शक्तिशाली फ्लेयर हुए, तो कुछ घंटों से लेकर कई घंटों तक रेडियो ब्लैकआउट संभव है।

क्या धरती पर अंधेरा छा सकता है? कितना वास्तविक है यह खतरा?

लोगों के मन में सबसे बड़ा डर यही है—क्या पूरी दुनिया अंधेरे में डूब सकती है?

विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है:

  • पूर्ण वैश्विक ब्लैकआउट की संभावना बेहद कम है
  • लेकिन स्थानीय और क्षेत्रीय बिजली ग्रिड पर असर पड़ सकता है
  • उच्च अक्षांश वाले देशों में खतरा अधिक होता है

इतिहास गवाह है:

  • 1859 का Carrington Event इतना शक्तिशाली था कि टेलीग्राफ सिस्टम जल गए थे
  • 1989 में कनाडा के क्यूबेक में सौर तूफान से 9 घंटे का ब्लैकआउट हुआ था

निष्कर्ष: डर नहीं, सतर्कता जरूरी

सूरज का यह उग्र रूप डराने वाला जरूर है, लेकिन मानव विज्ञान और तकनीक आज पहले से कहीं अधिक सक्षम है। लगातार मॉनिटरिंग, एडवांस चेतावनी सिस्टम और अंतरिक्ष एजेंसियों की सतर्कता के चलते बड़े नुकसान की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है।

फिर भी यह घटना एक चेतावनी है कि हमारी आधुनिक दुनिया कितनी हद तक सूरज की गतिविधियों पर निर्भर है। आने वाले समय में सौर तूफानों से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर और मजबूत रणनीति की जरूरत होगी।

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