क्या यह सिर्फ इस्तीफा है या हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के एक युग का अंत?
नई दिल्ली
जब कोई पत्रकार सत्ता से सवाल पूछना सिखा दे, भाषा को जनता की बना दे और डिजिटल मीडिया को गंभीर विमर्श का मंच बना दे—तो उसका जाना महज़ एक नौकरी छोड़ना नहीं होता।LALLANTOP और इंडिया टुडे ग्रुप के संपादकीय पद से SAURABH DWIVEDI का इस्तीफा भी कुछ ऐसा ही है।
12 साल बाद आया यह फैसला न सिर्फ मीडिया इंडस्ट्री के लिए बड़ा घटनाक्रम है, बल्कि हिंदी पत्रकारिता के भविष्य को लेकर कई सवाल भी खड़े करता है।
सोशल मीडिया पर हलचल है, पत्रकारों के व्हाट्सऐप ग्रुप्स गर्म हैं और दर्शकों के मन में एक ही सवाल घूम रहा है—अब कहां जा रहे हैं LALLANTOP वाले सौरभ द्विवेदी? taazanews24x7.com
दो ट्वीट, लेकिन अर्थ बहुत गहरे
अपने इस्तीफे की जानकारी देते हुए SAURABH DWIVEDIने दो ट्वीट किए।
पहले ट्वीट में उन्होंने LALLANTOP और इंडिया टुडे से अलग होने की बात कही।
दूसरे ट्वीट में उन्होंने लिखा—“अल्पविराम के बाद नई यात्रा”।
यह एक पंक्ति नहीं, एक संकेत था।
यह फुल स्टॉप नहीं था, यह विदाई नहीं थी—बल्कि यह इशारा था कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
यही वजह है कि उनके ट्वीट के बाद बधाइयों से ज़्यादा अटकलें शुरू हो गईं।

LALLANTOP: एक वेबसाइट नहीं, एक सोच
आज LALLANTOP को देखकर यह समझना आसान है कि यह एक सफल डिजिटल प्लेटफॉर्म है, लेकिन इसकी शुरुआत किसी बड़े कॉरपोरेट प्लान से नहीं हुई थी।
यह शुरुआत थी एक सोच से—हिंदी को उसकी असली जमीन पर लौटाने की सोच।
उस दौर में जब हिंदी न्यूज चैनल शोर, बहस और सनसनी के लिए जाने जाते थे, SAURABH DWIVEDIने एक अलग रास्ता चुना।
उन्होंने कहा—
- खबर गंभीर हो सकती है, भाषा नहीं
- सवाल तीखे हो सकते हैं, लहजा नहीं
- इंटरव्यू सम्मानजनक हो सकता है, फिर भी बेबाक
यही फॉर्मूला LALLANTOP की पहचान बना।
“द LALLANTOP शो”: सत्ता से आंख मिलाने की हिम्मत
“द LALLANTOP शो” ने हिंदी डिजिटल पत्रकारिता को नई पहचान दी।
यह सिर्फ एक इंटरव्यू शो नहीं था, बल्कि सत्ता, समाज और सिस्टम के सामने आईना रखने का मंच था।
नेता हों या अभिनेता, अफसर हों या विचारक—SAURABH DWIVEDIके सवालों में न तो चिल्लाहट होती थी, न चापलूसी।
बस तैयारी, संदर्भ और जनता का सवाल।
यही वजह है कि उनके इंटरव्यू अक्सर वायरल होते थे—क्योंकि वे दिखावटी नहीं, ज़रूरी होते थे।
एक बड़ा भ्रम: क्या SAURABH DWIVEDILALLANTOP के मालिक थे?
इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया पर यह बात तेजी से फैली कि SAURABH DWIVEDILALLANTOP के मालिक थे।
हकीकत यह है कि LALLANTOP इंडिया टुडे ग्रुप का हिस्सा है।
SAURABH DWIVEDIइसके संस्थापक संपादक, चेहरा और वैचारिक दिशा जरूर थे, लेकिन मालिकाना हक मीडिया ग्रुप के पास ही रहा।
यह फर्क इसलिए अहम है, क्योंकि इससे यह समझ आता है कि उनका जाना एक व्यक्तिगत ब्रांड छोड़ने से ज्यादा—एक संस्थागत भूमिका का अंत है।

12 साल: जब डिजिटल मीडिया को हल्के में लिया जाता था
आज डिजिटल पत्रकारिता को गंभीरता से लिया जाता है, लेकिन 10–12 साल पहले हालात अलग थे।
उस वक्त कहा जाता था—
“यूट्यूब पत्रकारिता नहीं है”
“डिजिटल सिर्फ टाइमपास है”
SAURABH DWIVEDIने इन धारणाओं को तोड़ा।
उन्होंने साबित किया कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी गहन, जिम्मेदार और असरदार पत्रकारिता हो सकती है।
युवा पत्रकारों के लिए स्कूल
LALLANTOP सिर्फ दर्शकों के लिए नहीं, बल्कि युवा पत्रकारों के लिए भी एक ट्रेनिंग ग्राउंड बना।
यहां काम करने वाले कई पत्रकार आज बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर अहम भूमिकाओं में हैं।
SAURABH DWIVEDIका सबसे बड़ा योगदान शायद यही रहा—
उन्होंने पत्रकारिता को ग्लैमर नहीं, जिम्मेदारी सिखाई।
राजदीप सरदेसाई की प्रतिक्रिया: एक सीनियर की ईमानदार विदाई
इंडिया टुडे ग्रुप के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने SAURABH DWIVEDIके इस्तीफे पर कहा—
“बहुत याद आओगे”
यह एक औपचारिक बयान नहीं था।
यह उस व्यक्ति की प्रतिक्रिया थी, जिसने देखा कि कैसे सौरभ ने हिंदी डिजिटल को एक नई ऊंचाई दी।
मीडिया इंडस्ट्री में ऐसी विदाइयां कम ही देखने को मिलती हैं।
सोशल मीडिया पर भावनाओं का सैलाब
SAURABH DWIVEDIके इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया दो हिस्सों में बंटा दिखा—
पहला वर्ग:
जो भावुक था, आभारी था और इसे हिंदी पत्रकारिता का नुकसान मान रहा था।
दूसरा वर्ग:
जो उत्साहित था और मान रहा था कि अब कुछ बड़ा आने वाला है।
दोनों ही बातों में सच्चाई है।
आलोचना भी रही, लेकिन असर कम नहीं हुआ
हर चर्चित पत्रकार की तरह SAURABH DWIVEDIभी आलोचनाओं से अछूते नहीं रहे।
कभी उनके सवालों को जरूरत से ज्यादा सख्त कहा गया,
कभी एजेंडा होने के आरोप लगे।
लेकिन एक बात तय रही—
उनकी पत्रकारिता ने लोगों को सोचने पर मजबूर किया।
और शायद यही पत्रकारिता की असली कसौटी है।
अब सबसे बड़ा सवाल: आगे क्या?
फिलहाल SAURABH DWIVEDIने यह साफ नहीं किया है कि वे आगे क्या करने जा रहे हैं।
लेकिन मीडिया इंडस्ट्री में तीन संभावनाओं पर सबसे ज्यादा चर्चा है—
1. नया डिजिटल प्लेटफॉर्म
संभावना है कि वे पूरी तरह स्वतंत्र होकर एक नया मीडिया वेंचर शुरू करें, जहां संपादकीय आज़ादी सर्वोपरि हो।
2. कंटेंट आधारित प्रोजेक्ट्स
पॉडकास्ट, डॉक्यूमेंट्री, लॉन्ग-फॉर्म जर्नलिज्म या किताब—ऐसे फॉर्मेट जिनमें गहराई की गुंजाइश हो।
3. विचार और प्रशिक्षण
मीडिया, राजनीति और समाज पर केंद्रित थिंक-टैंक या जर्नलिज्म ट्रेनिंग मॉडल।
जो भी हो, यह तय है कि वे कैमरे और सवालों से दूर नहीं रहेंगे।
हिंदी मीडिया के लिए चेतावनी भी
SAURABH DWIVEDIका जाना हिंदी मीडिया के लिए एक चेतावनी भी है।
यह याद दिलाता है कि—
- दर्शक अब बेवकूफ नहीं हैं
- भाषा से ज्यादा भरोसा मायने रखता है
- पत्रकार की साख चैनल से बड़ी हो सकती है
अगर मीडिया संस्थान यह नहीं समझ पाए, तो ऐसे और “अल्पविराम” देखने को मिलेंगे।
एक युग का अंत या नई शुरुआत?
इतिहास गवाह है—
जब भी कोई मजबूत आवाज़ संस्थान से अलग होती है, तो या तो वह खामोश हो जाती है या और बुलंद।
SAURABH DWIVEDIके मामले में दूसरा विकल्प ज्यादा संभव लगता है।

निष्कर्ष: अल्पविराम के बाद क्या?
SAURABH DWIVEDIने अपने ट्वीट में जिस “अल्पविराम” की बात की, वह आज हिंदी पत्रकारिता का सबसे चर्चित शब्द बन चुका है।
यह अल्पविराम डर का नहीं, संभावना का संकेत है।
यह ठहराव नहीं, तैयारी है।
LALLANTOP और इंडिया टुडे से उनकी विदाई एक अध्याय का अंत है, लेकिन किताब अभी खुली है।
और जब अगला पन्ना पलटेगा—तो तय है कि हिंदी पत्रकारिता एक बार फिर चर्चा में होगी।
क्योंकि SAURABH DWIVEDIगए नहीं हैं—
वे बस अल्पविराम पर रुके हैं।
LALLANTOP और इंडिया टुडे के संपादक पद से SAURABH DWIVEDIकी विदाई..।#TheLallantop #SaurabhDwivedi pic.twitter.com/UyPlhkgvkL
— Ashutosh Krishna ༗ (@IAmKrishnaaX) January 5, 2026