वंदे मातरम् के 150 वर्ष: राष्ट्रभक्ति, इतिहास और औपचारिक दर्जे पर मंथन

भूमिका: जब गीत भावना बन जाए

भारत के राष्ट्रीय जीवन में कुछ रचनाएँ ऐसी हैं, जो केवल शब्दों या सुरों तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि समय के साथ एक विचार, एक आंदोलन और एक सामूहिक चेतना में बदल जाती हैं। ‘वंदे मातरम्’ ऐसा ही एक गीत है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित यह अमर गीत आज अपने 150 वर्ष पूरे कर चुका है। 1876 में रचित ‘वंदे मातरम्’ ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को वह स्वर दिया, जिसने गुलामी की जंजीरों में जकड़े देशवासियों के भीतर स्वाभिमान, साहस और बलिदान की ज्वाला प्रज्वलित की। taazanews24x7.com

150वीं वर्षगांठ के अवसर पर देशभर में राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। उत्तर प्रदेश के कानपुर से लेकर देश के अन्य प्रमुख शहरों तक ‘वंदे मातरम्’ की गूंज सुनाई दी। खास तौर पर कानपुर सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर आयोजित कार्यक्रम ने आम लोगों का ध्यान आकर्षित किया, जहां रेलवे सुरक्षा बल (RPF) बैंड की देशभक्ति प्रस्तुति ने यात्रियों और दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।

कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर देशभक्ति की धड़कन

कानपुर सेंट्रल स्टेशन, जो आमतौर पर यात्रियों की भीड़, ट्रेनों की आवाजाही और रोजमर्रा की हलचल के लिए जाना जाता है, इस खास अवसर पर एक अलग ही रंग में नजर आया। स्टेशन परिसर में जैसे ही RPF बैंड ने ‘वंदे मातरम्’ की धुन छेड़ी, पूरा वातावरण तालियों और भारत माता की जय के नारों से गूंज उठा।

रेलवे प्रशासन और RPF के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति देना नहीं था, बल्कि आम नागरिकों को राष्ट्रीय गीत के ऐतिहासिक महत्व और उसकी भावना से जोड़ना भी था। स्टेशन पर मौजूद यात्री, जो अपने-अपने सफर की जल्दबाजी में थे, कुछ पल के लिए रुक गए। कई यात्रियों की आंखों में गर्व और भावुकता साफ झलक रही थी।

सेल्फी और वीडियो का दिखा क्रेज

इस आयोजन में एक दिलचस्प नजारा यह भी देखने को मिला कि युवा वर्ग और परिवारों में सेल्फी लेने का खासा उत्साह था। RPF बैंड की प्रस्तुति, तिरंगे से सजा मंच और पृष्ठभूमि में गूंजता ‘वंदे मातरम्’—इन सबने लोगों को अपने मोबाइल कैमरों में इस पल को कैद करने के लिए प्रेरित किया। सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों और वीडियो को साझा करते हुए लोगों ने देशभक्ति के संदेश भी लिखे।

यह दृश्य इस बात का संकेत था कि आज की डिजिटल पीढ़ी भी राष्ट्रभक्ति की भावना से जुड़ना चाहती है, बस उसके अभिव्यक्ति के माध्यम बदल गए हैं।

‘वंदे मातरम्’: एक गीत नहीं, स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा

‘वंदे मातरम्’ का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि यह एक सुंदर रचना है, बल्कि इसलिए है कि यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा बन चुका था। 20वीं सदी के प्रारंभ में जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, तब यह गीत क्रांतिकारियों और आंदोलनकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत था।

1905 के बंग-भंग आंदोलन से लेकर विभिन्न जन आंदोलनों तक, ‘वंदे मातरम्’ का उद्घोष लोगों को एकजुट करता था। अंग्रेजी शासन के दौरान इस गीत को गाने पर कई बार प्रतिबंध भी लगाए गए, लेकिन इसके बावजूद यह जनता के दिलों से कभी नहीं निकला।

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना का ऐतिहासिक संदर्भ

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने ‘वंदे मातरम्’ को अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया था। इस गीत में मातृभूमि को देवी के रूप में चित्रित किया गया है। इसकी पंक्तियों में प्रकृति, भूमि और राष्ट्र के प्रति श्रद्धा का भाव झलकता है।

यह गीत उस समय लिखा गया, जब भारत औपनिवेशिक शासन के दबाव में था। ऐसे दौर में मातृभूमि की वंदना का विचार अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम था। यही कारण है कि ‘वंदे मातरम्’ ने जल्द ही जन-जन में अपनी जगह बना ली।

संविधान में ‘वंदे मातरम्’ का स्थान

स्वतंत्रता के बाद जब भारत का संविधान तैयार हुआ, तब राष्ट्रगान के रूप में ‘जन गण मन’ को अपनाया गया, जबकि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया। संविधान सभा की बहसों में यह स्पष्ट किया गया था कि ‘वंदे मातरम्’ का सम्मान राष्ट्रगान के समान ही होगा, लेकिन दोनों की भूमिकाएँ अलग-अलग होंगी।

यह संतुलन भारत की विविधता और समावेशी संस्कृति को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था।

औपचारिक दर्जे पर केंद्र सरकार का मंथन

अब, 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर ‘वंदे मातरम्’ एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान औपचारिक दर्जा देने पर गंभीरता से विचार कर रही है। गृह मंत्रालय की एक उच्चस्तरीय बैठक में राष्ट्रीय गीत के गायन से जुड़े नियम, समय, स्थान और सम्मान से संबंधित पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई।

सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में यह भी विचार किया गया कि किन अवसरों पर ‘वंदे मातरम्’ का गायन अनिवार्य या वैकल्पिक रूप से किया जा सकता है, ताकि इसकी गरिमा बनी रहे और किसी प्रकार का भ्रम न हो।

विशेषज्ञों की राय और संवैधानिक पहलू

संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी प्रकार के औपचारिक दर्जे में बदलाव से पहले व्यापक चर्चा और सहमति आवश्यक है। भारत जैसे बहुलतावादी देश में प्रतीकों और परंपराओं को लेकर संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।

कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान के समान दर्जा देने से इसकी ऐतिहासिक और भावनात्मक महत्ता और अधिक मजबूत होगी, वहीं कुछ लोग इसे वर्तमान व्यवस्था के अनुरूप बनाए रखने के पक्षधर हैं।

जनभावना और सामाजिक प्रतिक्रिया

150वीं वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रमों और सोशल मीडिया प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट है कि ‘वंदे मातरम्’ आज भी लोगों के दिलों में विशेष स्थान रखता है। कई नागरिकों ने इसे राष्ट्रीय अस्मिता का प्रतीक बताया, तो कुछ ने इसे स्वतंत्रता संग्राम की अमिट स्मृति कहा।

कानपुर जैसे शहरों में हुए सार्वजनिक आयोजनों ने यह दिखाया कि राष्ट्रीय गीत केवल सरकारी समारोहों तक सीमित नहीं है, बल्कि आम जनजीवन का हिस्सा बन चुका है।

शिक्षा और युवा पीढ़ी में ‘वंदे मातरम्’ की भूमिका

शिक्षाविदों का मानना है कि स्कूलों और कॉलेजों में ‘वंदे मातरम्’ के ऐतिहासिक संदर्भ को पढ़ाया जाना चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी इसके वास्तविक महत्व को समझ सके। केवल गीत गाना ही नहीं, बल्कि इसके पीछे की भावना और संघर्ष की कहानी जानना भी जरूरी है।

डिजिटल युग में राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति

आज के दौर में राष्ट्रभक्ति की अभिव्यक्ति के तरीके बदल गए हैं। सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म और डिजिटल अभियानों के माध्यम से ‘वंदे मातरम्’ नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है। कानपुर सेंट्रल स्टेशन पर दिखा सेल्फी क्रेज इसी बदलाव का प्रतीक है, जहां परंपरा और आधुनिकता का संगम नजर आया।

आगे की राह

‘वंदे मातरम्’ की 150वीं वर्षगांठ केवल अतीत को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि यह भविष्य की दिशा तय करने का भी समय है। चाहे इसे राष्ट्रगान के समान औपचारिक दर्जा मिले या नहीं, इसकी आत्मा और संदेश भारतीय जनमानस में हमेशा जीवित रहेंगे।

भविष्य में नीतिगत और सांस्कृतिक प्रभाव

यदि केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान के समान औपचारिक दर्जा देती है, तो इसका प्रभाव केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे सरकारी कार्यालयों, शैक्षणिक संस्थानों, सार्वजनिक समारोहों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की सांस्कृतिक पहचान और अधिक सशक्त हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना और गहरी होगी, हालांकि इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश और संवैधानिक संतुलन बेहद जरूरी होगा।

विभिन्न राज्यों में आयोजन और जनसहभागिता

150वीं वर्षगांठ के अवसर पर केवल कानपुर ही नहीं, बल्कि दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, चेन्नई और लखनऊ जैसे शहरों में भी विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। कहीं प्रभात फेरियां निकाली गईं, तो कहीं सांस्कृतिक संध्या और संगोष्ठियों का आयोजन हुआ। इन आयोजनों में स्कूली बच्चों, एनसीसी कैडेट्स, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों की भागीदारी देखने को मिली। इससे स्पष्ट है कि ‘वंदे मातरम्’ किसी एक क्षेत्र या भाषा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश की साझा धरोहर है।

मीडिया और साहित्य में ‘वंदे मातरम्’ की पुनर्व्याख्या

समकालीन मीडिया और साहित्य में भी ‘वंदे मातरम्’ को नए संदर्भों में प्रस्तुत किया जा रहा है। डॉक्यूमेंट्री, लेख, पुस्तकें और डिजिटल कंटेंट के माध्यम से इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पक्षों पर नई पीढ़ी का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। इससे यह गीत केवल अतीत की स्मृति न रहकर वर्तमान और भविष्य की चेतना का हिस्सा बनता जा रहा है।

निष्कर्ष

डेढ़ सौ वर्षों की यात्रा में ‘वंदे मातरम्’ ने भारत को गुलामी से आजादी तक और आजादी से आधुनिक राष्ट्र बनने तक का सफर तय करते हुए देखा है। कानपुर सेंट्रल स्टेशन जैसे सार्वजनिक स्थानों पर गूंजता यह गीत इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रभक्ति किसी एक मंच या अवसर की मोहताज नहीं होती। यह लोगों के दिलों में बसती है और समय-समय पर नए रूप में सामने आती रहती है।

150वीं वर्षगांठ के मौके पर देशभर में दिखी भागीदारी और केंद्र सरकार का औपचारिक दर्जे पर मंथन इस बात का संकेत है कि ‘वंदे मातरम्’ आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना अपने रचनाकाल में था। यह गीत मातृभूमि के प्रति प्रेम, सम्मान और समर्पण का प्रतीक है और आने वाली पीढ़ियों को भी यही संदेश देता रहेगा।

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