720 किलो सोने से शुरू हुई जांच, जिसने सिस्टम, तस्करों और कानून – तीनों की असलियत खोल दी
OTT प्लेटफॉर्म्स पर क्राइम थ्रिलर अब कोई नई चीज़ नहीं रह गई है। हर हफ्ते कोई न कोई नई सीरीज़ आती है, जिसमें पुलिस, एजेंसियां, अपराधी और बड़े खुलासे दिखाए जाते हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि ज़्यादातर शोज़ अपराध को एक रोमांचक तमाशे की तरह पेश करते हैं। गोली, गाड़ी, गुस्सा और ग्लैमर — यही फॉर्मूला बन चुका है। taazanews24x7.com
ऐसे माहौल में ‘Taskaree: The Smuggler’s Web’ एक अलग रास्ता चुनती है। यह सीरीज़ तस्करी को न तो रोमांटिक बनाती है, न ही उसे हीरोइज़ करती है। बल्कि यह उस सच्चाई की तरफ इशारा करती है, जो अक्सर खबरों की सुर्खियों में आकर भी पूरी तरह समझी नहीं जाती — कि तस्करी सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि सिस्टम की सबसे खतरनाक कमजोरी है।
नीरज पांडे की यह वेब सीरीज़ शोर मचाने के बजाय धीरे-धीरे असर करती है। यह वही कहानी है, जो खत्म होने के बाद भी दिमाग में घूमती रहती है।

कहानी की जड़: 720 किलो सोना और उससे कहीं बड़ा खेल
सीरीज़ की शुरुआत 720 किलो सोने की तस्करी के एक केस से होती है। आंकड़ा बड़ा है, चौंकाने वाला है, लेकिन ‘Taskaree’ इसे सनसनी नहीं बनाती। यहां असली सवाल यह नहीं कि कितना सोना पकड़ा गया, बल्कि यह है कि
इतनी बड़ी तस्करी संभव कैसे हुई?
कहानी यहीं से गहराती है। यह दिखाया जाता है कि तस्करी कोई एक रात में होने वाला अपराध नहीं है। इसके पीछे महीनों की प्लानिंग, अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल और सबसे अहम — सिस्टम के भीतर मौजूद कमजोर कड़ियां होती हैं।
सीरीज़ दर्शक को यह समझने का मौका देती है कि अपराधी कानून से नहीं, बल्कि कानून की सीमाओं से खेलते हैं। और जब तक सिस्टम खुद मजबूत नहीं होता, तब तक ऐसे अपराध पूरी तरह खत्म नहीं हो सकते।
नीरज पांडे का नजरिया: अपराध को ग्लैमर से दूर रखना
नीरज पांडे की सबसे बड़ी पहचान यही है कि वे अपराध को कभी स्टाइलिश नहीं बनाते। उनकी कहानियों में अपराध हमेशा बोझिल, खतरनाक और डरावना लगता है — जैसा वह असल जिंदगी में होता है।
‘Taskaree’ में भी यही नजरिया दिखता है। यहां कोई स्लो-मोशन एंट्री नहीं है, कोई पंचलाइनबाज़ डायलॉग नहीं है। कहानी का टोन ठंडा, गंभीर और सधा हुआ है।
नीरज पांडे दर्शक पर भरोसा करते हैं। वे हर चीज़ समझाकर नहीं बताते, बल्कि संकेत छोड़ते हैं। यही वजह है कि यह सीरीज़ देखने वाले से ध्यान और धैर्य मांगती है — और बदले में उसे एक मजबूत अनुभव देती है।

इमरान हाशमी: बिना शोर मचाए सबसे मजबूत कड़ी
इमरान हाशमी का कस्टम ऑफिसर वाला किरदार इस सीरीज़ की रीढ़ है। यह रोल उनके पुराने इमेज से बिल्कुल अलग है। यहां न रोमांस है, न आक्रोश का प्रदर्शन। यह एक ऐसा ऑफिसर है जो सिस्टम को समझता है, उसकी सीमाओं को जानता है और फिर भी अपना काम पूरी ईमानदारी से करता है।
इमरान की एक्टिंग की सबसे बड़ी ताकत है — संयम।
उनकी आंखों में थकान है, चेहरे पर अनुभव की सख्ती है और बातचीत में एक ठहराव है। यह सब मिलकर उनके किरदार को पूरी तरह विश्वसनीय बनाता है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि यह इमरान हाशमी के करियर के सबसे परिपक्व और सधे हुए प्रदर्शन में से एक है।
शरद केलकर: वो विलेन जो कैमरे से ज्यादा सिस्टम में रहता है
शरद केलकर का किरदार पारंपरिक विलेन से अलग है। वह न चिल्लाता है, न धमकाता है। उसका आत्मविश्वास उसके नेटवर्क से आता है।
सीरीज़ यह साफ दिखाती है कि असली तस्कर अक्सर सामने नहीं आते। वे फाइलों, कॉल्स और कोड्स के पीछे रहते हैं। शरद केलकर इस सच्चाई को बेहद शांत तरीके से निभाते हैं।
उनका और इमरान हाशमी का आमना-सामना शारीरिक नहीं, मानसिक है। यही माइंड गेम सीरीज़ को थ्रिल देता है।
कस्टम ऑफिसर बनाम स्मगलर: शह और मात का खेल
‘Taskaree’ की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां अच्छाई और बुराई की लड़ाई सरल नहीं है। दोनों पक्ष समझदार हैं, दोनों के पास संसाधन हैं और दोनों गलतियां कर सकते हैं।
हर एपिसोड में यह महसूस होता है कि कोई भी कदम आखिरी साबित हो सकता है। यही अनिश्चितता सीरीज़ को बांधे रखती है।

7 एपिसोड, लेकिन भारी कंटेंट
आज की कई वेब सीरीज़ 8–10 एपिसोड में फैल जाती हैं और बीच में दम खो देती हैं। ‘Taskaree’ ऐसा नहीं करती। सात एपिसोड का फॉर्मेट चुस्त और प्रभावी है।
हर एपिसोड:
- कहानी को एक नई दिशा देता है
- किरदारों को गहराई देता है
- और जांच को अगले स्तर तक ले जाता है
कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि कुछ जबरदस्ती खींचा गया हो।
तकनीकी पक्ष: सादगी में असर
सीरीज़ का टेक्निकल ट्रीटमेंट उसके कंटेंट के मुताबिक है।
सिनेमैटोग्राफी ज्यादा चमकदार नहीं है, बल्कि रियल लोकेशन्स पर आधारित है।
बैकग्राउंड स्कोर वहां आता है, जहां जरूरी है — और चुप रहता है, जहां कहानी खुद बोल सकती है।
एडिटिंग सटीक है, जिससे कहानी की गति बनी रहती है।
सच्चाई से जुड़ाव: यही इसकी असली ताकत
‘Taskaree’ किसी को हीरो या विलेन बनाकर खुश नहीं करती। यह सवाल छोड़ती है।
यह दिखाती है कि जब सिस्टम में खामियां होती हैं, तब अपराध फलता-फूलता है।
यही वजह है कि यह सीरीज़ खत्म होने के बाद भी सोचने पर मजबूर करती है।
दर्शकों की प्रतिक्रिया: धीरे-धीरे बनी पकड़
यह कोई ट्रेंडिंग-टाइप शो नहीं है, लेकिन जिसने भी इसे गंभीरता से देखा, उसने इसकी तारीफ की।
खासतौर पर इमरान हाशमी की परफॉर्मेंस और नीरज पांडे की सोच को सराहा गया।
किन लोगों के लिए है यह सीरीज़?
‘Taskaree’ उनके लिए है:
- जो रियल क्राइम को गंभीरता से देखते हैं
- जिन्हें बिना फालतू ड्रामे का कंटेंट पसंद है
- जो थ्रिल के साथ सोचने वाली कहानियां चाहते हैं
अंतिम निष्कर्ष
‘Taskaree: The Smuggler’s Web’ यह साबित करती है कि क्राइम सीरीज़ सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि आईना भी हो सकती है।
यह आईना उस सिस्टम का है, जिसमें हम रहते हैं — जहां अपराध अक्सर ताकत से नहीं, कमजोरी से जन्म लेता है।
नीरज पांडे की सधी हुई कहानी और इमरान हाशमी की ईमानदार एक्टिंग इस सीरीज़ को OTT की भीड़ से अलग खड़ा करती है।
Netflix Series #Taskaree: #TheSmugglersWeb Streaming From 14th Jan On #Netflix.
— Cinema Wikipedia (@CinemaWikipedia) January 7, 2026
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