ब्राज़ील में COP30 क्लाइमेट समिट: जलवायु संकट की लड़ाई में एक निर्णायक मोड़

बेलेम (ब्राज़ील) — विश्व की लगभग 200 देशों की प्रतिनिधि ताबूतें और अभियानकार समर्पित मार्च के साथ इकट्ठे हुए हैं, क्योंकि COP30 (30वीं यूनाइटेड नेशन्स क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस) 6 से 21 नवंबर 2025 तक ब्राज़ील के अमेज़न क्षेत्र में स्थित शहर बेलेम में चल रही है। यह सम्मेलन न सिर्फ एक प्रतीकात्मक आयोजन है, बल्कि एक नैतिक और रणनीतिक मोड़ भी है — एक ऐसा मंच जहाँ वैश्विक नेताओं के बीच जलवायु संकट के समाधान का असली परीक्षण हो रहा है। Taazanews24x7.com

COP30 की भूमिका और उद्देश्य

COP का मतलब है “Conference of the Parties” — यानी उन देशों की बैठक जो संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (UNFCCC) का हिस्सा हैं। यह सम्मेलन वैश्विक जलवायु नीति, वित्त, और कार्रवाई की दिशा तय करने का प्रमुख मंच है।

ब्राज़ील की मेज़बानी इस बात का संकेत है कि देश न केवल अपनी पर्यावरणीय भूमिका को मजबूत करना चाहता है, बल्कि एक सक्रिय ग्लोबल नेतृत्व की ओर भी बढ़ रहा है। COP30 की मेजबानी उसे एक अवसर देती है कि वह अमेज़न वर्षावन की महत्ता पर विश्व का ध्यान आकर्षित कर सकें और दिखा सकें कि वह प्रकृति संरक्षण और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बना सकता है।

मुख्य एजेंडा में शामिल हैं:

1. 1.5°C लक्ष्य को पुनर्स्थापित करना

सम्मेलन का सबसे प्रमुख एजेंडा यही है कि पृथ्वी के औसत तापमान को औद्योगिक काल से पहले के स्तर की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जाए। विज्ञान साफ कहता है कि इसके आगे बढ़ने पर चरम मौसम घटनाएँ—सूखा, बाढ़, चक्रवात—और भी अधिक खतरनाक रूप ले सकती हैं। कई देश इस लक्ष्य को फिर से प्राथमिकता में लाने और इसके लिए अधिक कठोर कदम उठाने पर ज़ोर दे रहे हैं।

2. जलवायु वित्त की मजबूती

पिछले कई COP सम्मेलनों में विकसित देशों ने विकासशील देशों की मदद के लिए बड़े वित्तीय वादे किए थे। लेकिन उन वादों की पूर्ति आज भी अधूरी है। COP30 में उम्मीद है कि—

  • अनुकूलन (Adaptation)
  • शमन (Mitigation)
  • क्षति और हानि (Loss & Damage)

इन तीनों क्षेत्रों के लिए ठोस वित्तीय ढांचा तय हो सकेगा, ताकि ज़मीनी स्तर पर काम तेज़ी से आगे बढ़े।

3. जीवाश्म ईंधन चरणबद्ध समाप्ति

जीवाश्म ईंधन को धीरे-धीरे खत्म करने की मांग वैश्विक मंच पर पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत हुई है।
ब्राज़ील की सरकार और देश की पर्यावरण मंत्री मरीना सिल्वा ने एक स्वैच्छिक और आत्म-निर्धारित रोडमैप का प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत देश आने वाले वर्षों में तेल, गैस और कोयले पर निर्भरता घटाने का लक्ष्य रखेगा। यह पहल उन देशों के लिए उदाहरण बन सकती है जो ऊर्जा परिवर्तन (energy transition) की राह पर चल रहे हैं।

4. वन संरक्षण: अमेज़न पर फोकस

अमेज़न जैसे ट्रॉपिकल वर्षावन पृथ्वी के सबसे बड़े कार्बन सिंक हैं। COP30 में इन वनों की रक्षा, अवैध कटाई पर रोक और आदिवासी समुदायों के अधिकारों को मजबूत करने जैसे विषयों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सम्मेलन का मेजबान होने के नाते ब्राज़ील पर भी बड़ी ज़िम्मेदारी है कि वह अमेज़न क्षेत्र में सुधारों को गति दे।

मुख्य मुद्दे और झड़पें

जहाँ COP30 उम्मीद की किरण है, वहीं इस सम्मेलन के दौरान कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी सामने आई हैं।

1. फायर-इमरजेंसी और सुरक्षा सवाल

20 नवंबर को बेलेम कॉन्फ्रेंस सेंटर के एक पवेलियन में अचानक आग लग गई। आग लगते ही पूरे परिसर को तुरंत खाली कराया गया और ब्राज़ील की अग्निशमन टीम ने सिर्फ छह मिनट में आग पर काबू पा लिया।
इस हादसे में 13 लोगों को धुएँ की वजह से अस्पताल में इलाज की आवश्यकता पड़ी।

यह घटना कई सवाल खड़े करती है—

  • क्या बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के अस्थायी ढाँचों में पर्याप्त सुरक्षा मौजूद है?
  • क्या आग सुरक्षा मानकों का समय रहते निरीक्षण किया जा रहा था?

सुरक्षा को लेकर यह चेतावनी है कि जलवायु सम्मेलन जैसे विशाल आयोजन केवल राजनीतिक घोषणाओं का मंच नहीं होते, बल्कि इनकी तैयारी में उच्चस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है।

2. फॉसल फ्यूल फेज-आउट पर अंतरराष्ट्रीय मतभेद

ब्राज़ील की पर्यावरण मंत्री मरीना सिल्वा ने सम्मेलन में बोलते हुए अन्य देशों से आग्रह किया है कि वे जीवाश्म ईंधन से निकलने की दिशा में आत्म-निर्धारित रोडमैप तैयार करें। इसे उन्होंने “नैतिक प्रतिक्रिया” कहा। हालांकि, सभी देश इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं — आर्थिक रूप से जीवाश्म ईंधन पर निर्भर देशों में विरोध की संभावना है।

3. वित्तीय दबाव: क्लाइमेट फाइनेंस

ब्राज़ील ने COP30 के लिए एक वित्तीय पहल की शुरुआत की है — COP30 Circle of Finance Ministers, जिसका लक्ष्य है “बाकू-से-बेलेम रोडमैप” के तहत 2035 तक 1.3 ट्रिलियन डॉलर जलवायु वित्त उपलब्ध कराना। यह बड़ी महत्वाकांक्षी प्रक्रिया है, क्योंकि विकासशील देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन चाहिए।

4. इंडिजेनस मुद्दे: आवाज़ और अधिकार की मांग

इस बार के COP मंच पर स्वदेशी समुदायों ने खुलकर अपनी चिंताएँ रखी हैं। उनका कहना है कि जंगलों पर उनका पारंपरिक अधिकार न केवल मान्यता का हकदार है, बल्कि संरक्षण की किसी भी वैश्विक रणनीति में उनकी भागीदारी को केंद्र में रखा जाना चाहिए। कई समूहों का स्पष्ट मत है कि उनकी आवाज़ अभी भी हाशिये पर है—नीतिगत चर्चाओं में उनकी भूमिका प्रतीकात्मक रहती है, जबकि ज़मीन, जंगल और पारिस्थितिक संतुलन के असली संरक्षक वही हैं।

जलवायु न्याय की पुकार

विकासशील देशों की ओर से जलवायु न्याय का मुद्दा इस COP में और अधिक मुखर रहा। मांग साफ़ है—विकसित देशों और वैश्चिक वित्तीय संस्थानों को यह सुनिश्चित करना होगा कि जलवायु वित्त और आधुनिक तकनीक का वास्तविक लाभ उन देशों तक पहुँचे जो जलवायु संकट का बोझ उठाते रहे हैं, पर इसके लिए जिम्मेदार कम से कम हैं। भरोसे की पुनर्स्थापना और ठोस प्रतिबद्धताओं की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

विश्व नेताओं की भागीदारी पर सवाल

रिपोर्टें यह संकेत देती हैं कि इस बार उच्च-स्तरीय नेताओं की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम है। कुछ विशेषज्ञ इसे राजनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव के रूप में देख रहे हैं, वहीं कुछ इसे वैश्विक स्तर पर जलवायु राजनीति की जटिलताओं का संकेत मानते हैं। किसी भी स्थिति में, कम होती भागीदारी के राजनीतिक और व्यवहारिक परिणामों पर नजरें टिकी हैं।

आशाएं और संभावनाएं: COP30 के सकारात्मक संकेत

इन चुनौतियों के बीच, COP30 कई उम्मीदें भी जगाता है:

वन संरक्षण पर नया फोकस

ब्राज़ील द्वारा “ट्रॉपिकल फ़ॉरेस्ट फ़ॉरेवर फैसिलिटी” जैसी पहल यह दिखाती है कि अमेज़न और अन्य उष्णकटिबंधीय वनों को केवल संरक्षित करने की ही नहीं, बल्कि उनके पारिस्थितिक मूल्य को आर्थिक रूप से समझने और मजबूत करने की भी कोशिशें तेज़ हो रही हैं।

नवीकरणीय ऊर्जा की ओर तेज़ कदम

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने पुनः यह स्पष्ट किया है कि दुनिया को कोयला और जीवाश्म ईंधन से नवीकरणीय विकल्पों की ओर तेजी से जाना होगा। ब्राज़ील समेत कई देश इस ऊर्जा परिवर्तन को अवसर की तरह देख रहे हैं और नई नीतियों पर ठोस कदम बढ़ा रहे हैं।

न्याय आधारित जलवायु वित्त

“COP30 Circle of Finance Ministers” जैसी पहलकदमियाँ इस बात का संकेत हैं कि जलवायु वित्त अब केवल वादों का विषय न रहकर वास्तविक और न्यायपूर्ण साझेदारी की दिशा में बढ़ रहा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संसाधनों का वितरण जरूरतों और ऐतिहासिक जिम्मेदारियों के अनुरूप हो।

वैश्विक संवाद का नया अध्याय

यह सम्मेलन उन देशों के बीच संवाद का महत्वपूर्ण मंच बन रहा है जिन्हें अक्सर दो अलग श्रेणियों—विकसित और विकासशील—में बांट दिया जाता है। जलवायु संकट की साझा चुनौती ने नई बातचीत और सहयोग की संभावनाएँ पैदा की हैं। अब यह देखना होगा कि क्या ये संवाद संकट को एक वैश्विक अवसर में बदल पाएंगे।

निष्कर्ष

COP30 सिर्फ एक कॉन्फ्रेंस नहीं है, यह विश्व की एक बड़ी परीक्षा है — क्या हम सचमुच जलवायु कार्रवाई को सिर्फ बयानों तक सीमित रहने नहीं बल्कि वास्तविकता में बदल सकते हैं? क्या देश, विशेष रूप से विकासशील और अमेज़न-आधारित देश, सहमति के महत्वपूर्ण मोर्चों (जैसे जीवाश्म ईंधन, वित्त, वन संरक्षण) पर आगे बढ़ सकते हैं?

बेलेम में यह ही सवाल उठता है: क्या यह COP वह पायदान बनेगा जहाँ वादों से कार्रवाई की ओर मोड़ आएगा? या फिर यह उसी पुरानी पैटर्न का हिस्सा बनेगा, जहाँ शक्तिशाली देश वित्त और पर्यावरणीय दायित्वों से बच निकलते हैं? विश्व की आँखें अब COP30 पर टिक गई हैं — और नतीजे न केवल राजनीतिक होंगे बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों की उम्मीदों और अस्तित्व से जुड़े होंगे।

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