नई दिल्ली, 2 नवंबर 2025:
अमेरिका में टेक प्रोफेशनल्स के वीज़ा रिजेक्शन: अमेरिका में काम करने का सपना देखने वाले हजारों टेक प्रोफेशनल्स के लिए हाल के महीनों में मुश्किलें बढ़ गई हैं। अमेरिकी वर्क वीज़ा — खासकर H-1B और L-1 वीज़ा — के रिजेक्शन के मामलों में तेज़ी आई है। जहां पहले भारतीय और अन्य विदेशी आईटी प्रोफेशनल्स को वीज़ा मिलने में अपेक्षाकृत आसानी होती थी, वहीं अब अमेरिकी प्रशासन के कड़े नियमों और अतिरिक्त जांच प्रक्रियाओं के कारण कई योग्य उम्मीदवारों के आवेदन रद्द किए जा रहे हैं। taazanews24x7.com
H-1B वीज़ा क्या है और क्यों है यह अहम?
H-1B वीज़ा अमेरिका में काम करने की चाह रखने वाले टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मेडिकल और अन्य स्पेशलाइज्ड क्षेत्रों के प्रोफेशनल्स के लिए सबसे अहम वर्क वीज़ा है। हर साल हजारों भारतीय इस वीज़ा के लिए आवेदन करते हैं, क्योंकि अमेरिका के सिलिकॉन वैली और अन्य तकनीकी शहरों में भारतीय प्रतिभा की काफी मांग है।
लेकिन 2024 के अंत से अब तक, अमेरिकी इमिग्रेशन विभाग (USCIS) ने वीज़ा मंजूरी के नियमों में कई बदलाव किए हैं। इसका असर खासकर भारतीय टेक वर्कर्स पर पड़ा है, जो अमेरिका में बड़े आईटी प्रोजेक्ट्स या कंपनियों में काम करने के लिए आवेदन करते हैं।
वीज़ा रिजेक्शन बढ़ने के प्रमुख कारण
- कड़े दस्तावेज़ सत्यापन नियम:
अब अमेरिकी वीज़ा अधिकारी प्रत्येक दस्तावेज़ की विस्तृत जांच कर रहे हैं। कई मामलों में छोटे दस्तावेज़ी अंतर या अस्पष्टता के कारण आवेदन खारिज कर दिए जा रहे हैं। - क्लाइंट लोकेशन और जॉब रोल पर संदेह:
कई टेक कंपनियां अपने कर्मचारियों को क्लाइंट साइट पर भेजती हैं। अब अमेरिकी दूतावास इस बात की विस्तृत पुष्टि कर रहा है कि आवेदक वास्तव में उसी क्लाइंट साइट पर कार्य करेगा या नहीं। जॉब प्रोफाइल में कोई भी अस्पष्टता रिजेक्शन का कारण बन रही है। - ‘Buy American, Hire American’ नीति का प्रभाव:
ट्रंप प्रशासन के दौरान शुरू हुई यह नीति अब भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावी है। अमेरिकी सरकार स्थानीय नागरिकों को प्राथमिकता देने पर जोर दे रही है, जिससे विदेशी टेक प्रोफेशनल्स को नौकरी पाने और वीज़ा हासिल करने में दिक्कतें आ रही हैं। - AI और ऑटोमेशन के युग में नौकरी का संकट:
अमेरिका में कई टेक कंपनियों ने पिछले एक साल में छंटनी की है और नई भर्तियों को सीमित किया है। ऐसे में विदेशी कर्मचारियों की मांग में गिरावट आई है, जिससे वीज़ा स्वीकृति दर पर असर पड़ा है।
भारतीय आईटी सेक्टर पर असर
भारतीय आईटी कंपनियां जैसे Infosys, TCS, Wipro, HCL, और Tech Mahindra अमेरिका में अपने हज़ारों कर्मचारियों के लिए H-1B वीज़ा पर निर्भर हैं।
पिछले कुछ महीनों में इन कंपनियों के वीज़ा आवेदन रिजेक्शन दर में 25-30% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
NASSCOM (नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विस कंपनिज़) के अनुसार, वीज़ा रिजेक्शन में बढ़ोतरी से न केवल भारतीय कंपनियों के प्रोजेक्ट्स पर असर पड़ रहा है बल्कि अमेरिका में भारतीय तकनीकी विशेषज्ञों की कमी भी महसूस की जा रही है।
टेक इंडस्ट्री के विशेषज्ञों की राय
आईटी इंडस्ट्री के विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थिति भारतीय प्रतिभा के लिए चिंता का विषय है।
Infosys के एक पूर्व अधिकारी के अनुसार —
“अमेरिका में वर्क वीज़ा रिजेक्शन की मौजूदा दर भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए बड़ी चुनौती है। इससे न केवल इंडिविजुअल करियर बल्कि कंपनियों की वैश्विक डिलीवरी मॉडल पर भी असर पड़ रहा है।”
वहीं, कई टेक स्टार्टअप संस्थापक अब वैकल्पिक देशों जैसे कनाडा, यूके, जर्मनी, और ऑस्ट्रेलिया की ओर रुख कर रहे हैं, जहां वर्क वीज़ा की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान और स्थिर है।
सरकारी स्तर पर क्या हो रहा है?
भारत सरकार ने अमेरिका के साथ राजनयिक स्तर पर इस मुद्दे को उठाया है।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने हाल ही में कहा —
“भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स की भूमिका अमेरिकी अर्थव्यवस्था में अहम है। वीज़ा प्रोसेस को सुगम बनाना दोनों देशों के हित में है।”
हालांकि अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि वह किसी भी देश के साथ भेदभाव नहीं कर रहा, बल्कि सभी आवेदन ‘समान नियमों’ के तहत परखे जा रहे हैं।
टेक प्रोफेशनल्स के लिए सुझाव
- सटीक दस्तावेज़ तैयार करें:
वीज़ा फॉर्म और जॉब लेटर में कोई असंगति न हो। कंपनी, क्लाइंट और प्रोजेक्ट डिटेल स्पष्ट रूप से दर्ज करें। - पहले से इंटरव्यू की तैयारी करें:
वीज़ा अधिकारी के प्रश्नों का सटीक और आत्मविश्वासपूर्ण उत्तर दें। - क्लाइंट लेटर अपडेट रखें:
यह दस्तावेज़ अक्सर रिजेक्शन से बचा सकता है, क्योंकि यह आपके वास्तविक काम का प्रमाण होता है। - वैकल्पिक देशों की ओर भी विचार करें:
अमेरिका के अलावा कनाडा, यूके या यूरोप में तकनीकी क्षेत्र के अवसर भी बढ़ रहे हैं।
अमेरिकी कंपनियों में प्रभाव
Google, Microsoft, Amazon, और Meta जैसी अमेरिकी टेक कंपनियां जिनमें बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं, अब वीज़ा रिजेक्शन की वजह से अपने अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट्स की गति धीमी पड़ने की शिकायत कर रही हैं।
कई कंपनियों को अब रिमोट वर्क मॉडल अपनाने या कर्मचारियों को अन्य देशों में ट्रांसफर करने की योजना बनानी पड़ी है।
H-1B लॉटरी सिस्टम पर उठ रहे सवाल
H-1B वीज़ा के लिए हर साल लाखों आवेदन आते हैं, जबकि केवल 85,000 आवेदन ही चुने जाते हैं।
USCIS द्वारा चलाया जाने वाला “लॉटरी सिस्टम” अब विवादों में है।
कई उम्मीदवारों का कहना है कि यह सिस्टम पारदर्शी नहीं है और कई बार बड़े कॉर्पोरेट समूहों को प्राथमिकता मिल जाती है।
भविष्य की संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में अमेरिकी वर्क वीज़ा नीतियों में और पारदर्शिता की जरूरत है।
टेक्नोलॉजी सेक्टर की वैश्विक प्रकृति को देखते हुए, अमेरिका को विदेशी प्रतिभा को आकर्षित करने की दिशा में नीति सुधार करने होंगे।
यदि अमेरिका अपनी सख्ती जारी रखता है, तो भारतीय प्रोफेशनल्स अन्य देशों की ओर रुख कर सकते हैं — जिससे अमेरिकी टेक सेक्टर को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है।
निष्कर्ष अमेरिका में टेक प्रोफेशनल्स के वर्क वीज़ा रिजेक्शन की बढ़ती दर एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है।
जहां भारतीय आईटी कंपनियां अमेरिका के प्रोजेक्ट्स पर निर्भर हैं, वहीं यह सख्ती दोनों देशों की आर्थिक साझेदारी पर असर डाल सकती है।
सरकारों और उद्योग संगठनों को मिलकर ऐसा समाधान निकालना होगा, जिससे कुशल विदेशी प्रोफेशनल्स को न्यायपूर्ण अवसर मिल सके और अमेरिका की तकनीकी प्रगति भी प्रभावित न हो।