पंजाब की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे हैं जो समय के साथ धुंधले पड़ जाते हैं, लेकिन कुछ नाम ऐसे भी होते हैं जो चाहे सत्ता में हों या विपक्ष में, लगातार चर्चा के केंद्र में बने रहते हैं। BIKRAM SINGH MAJITHIA उसी दूसरी श्रेणी में आते हैं। वह नेता जिनका नाम आते ही समर्थक और विरोधी—दोनों की प्रतिक्रिया तेज़ हो जाती है।
मजीठिया न तो सिर्फ एक पारंपरिक नेता हैं और न ही केवल विवादों की उपज। वह पंजाब की राजनीति की उस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, जहां विरासत, सत्ता, संगठन, टकराव और जिद—सब एक साथ चलते हैं। यही वजह है कि पिछले दो दशकों से उनका नाम पंजाब के सियासी विमर्श से बाहर नहीं गया।
मजीठा रियासत से निकली सियासी पहचान
BIKRAM SINGH MAJITHIA का ताल्लुक मजीठा रियासत से है—एक ऐसा नाम जो पंजाब के इतिहास और सामाजिक संरचना में गहराई से जुड़ा रहा है। मजीठिया परिवार सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी प्रभावशाली माना जाता रहा है। taazanews24x7.com
यही पृष्ठभूमि मजीठिया के व्यक्तित्व में साफ दिखती है—आत्मविश्वास, आक्रामकता और सत्ता से बातचीत करने की आदत।
उनकी शादी हरसिमरत कौर बादल से हुई, जो खुद एक कद्दावर नेता और केंद्र सरकार में मंत्री रह चुकी हैं। इस रिश्ते ने मजीठिया को बादल परिवार से जोड़ दिया—वह परिवार जिसने दशकों तक पंजाब की राजनीति की दिशा तय की।
राजनीति में एंट्री: सिर्फ नाम नहीं, मेहनत भी
यह कहना आसान है कि मजीठिया को राजनीति विरासत में मिली, लेकिन यह पूरी सच्चाई नहीं है। अकाली दल में उनकी शुरुआत जमीनी राजनीति से हुई। संगठन के भीतर काम, कार्यकर्ताओं से संपर्क और चुनावी रणनीतियों में सक्रिय भूमिका—इन सबने उन्हें पार्टी के भीतर मजबूत किया।
धीरे-धीरे वह शिरोमणि अकाली दल के उन नेताओं में शामिल हो गए जिन पर पार्टी मुश्किल वक्त में भरोसा करती थी। उनकी पहचान एक ऐसे नेता की बनी जो पीछे नहीं हटता, चाहे हालात कितने ही प्रतिकूल क्यों न हों।

मंत्री पद और सत्ता का दौर
अकाली-भाजपा सरकार के दौरान मजीठिया को मंत्री पद मिला। यह उनके राजनीतिक करियर का अहम पड़ाव था। सत्ता में रहते हुए उन्होंने कई विभागों की जिम्मेदारी संभाली और सरकार के आक्रामक प्रवक्ताओं में गिने जाने लगे।
वह मीडिया में खुलकर बोलने वाले नेता रहे। विरोधियों पर तीखे हमले, विपक्षी सवालों के सीधे जवाब और पार्टी लाइन का मजबूती से बचाव—यही उनकी कार्यशैली रही।
उनके समर्थक कहते हैं कि मजीठिया ने सत्ता में रहते हुए कमजोर नेता की भूमिका कभी नहीं निभाई।
विवाद: जो मजीठिया से अलग नहीं हुए
BIKRAM SINGH MAJITHIA का नाम आते ही विवादों का जिक्र अपने आप शुरू हो जाता है। उनके खिलाफ समय-समय पर गंभीर आरोप लगे, जिन पर पंजाब की राजनीति में लंबी बहसें हुईं।
विपक्ष ने उन्हें अक्सर निशाने पर रखा। विधानसभा से लेकर सड़क तक, मजीठिया का नाम कई बार राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बना।
लेकिन दिलचस्प बात यह रही कि इन विवादों के बावजूद मजीठिया पूरी तरह हाशिए पर कभी नहीं गए।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यही उनकी सबसे बड़ी ताकत भी है—वह दबाव में टूटते नहीं हैं।
रणनीति: कब चुप रहना है, कब हमला करना है
मजीठिया की राजनीति को अगर एक शब्द में समझना हो तो वह है—कैल्कुलेटेड।
वह हर वक्त बयानबाज़ी नहीं करते, लेकिन जब करते हैं तो सीधा असर दिखता है।
कई मौकों पर उन्होंने रणनीतिक चुप्पी अपनाई, तो कई बार अचानक आक्रामक होकर सियासी माहौल बदल दिया। यह गुण उन्हें बाकी नेताओं से अलग करता है।
शिरोमणि अकाली दल में स्थिति
जब शिरोमणि अकाली दल कठिन दौर से गुजर रहा था, तब मजीठिया उन नेताओं में रहे जो पार्टी के साथ मजबूती से खड़े दिखे।
पार्टी के भीतर उन्हें एक हार्डकोर लीडर माना जाता है—जो न तो लाइन बदलता है और न ही दबाव में समझौता करता है।
कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पहुंच और संगठन पर पकड़ ने उन्हें पार्टी के भीतर प्रासंगिक बनाए रखा।
चुनावी मैदान और जनाधार
मजीठिया का मुख्य जनाधार मजीठा और आसपास के इलाकों में माना जाता है। वहां उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो—
- इलाके में मौजूद रहता है
- कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करता है
- संकट में पहुंचने से पीछे नहीं हटता
हालांकि बदलते राजनीतिक समीकरणों ने उनके लिए चुनावी चुनौतियां भी बढ़ाई हैं।
पंजाब की बदली राजनीति और मजीठिया
पिछले कुछ वर्षों में पंजाब की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है। नई पार्टियों का उभार, पारंपरिक दलों से जनता की नाराज़गी और सत्ता विरोधी माहौल—इन सबका असर मजीठिया जैसे नेताओं पर भी पड़ा।
अब राजनीति सिर्फ विरासत से नहीं चलती, बल्कि परफॉर्मेंस और पब्लिक परसेप्शन से तय होती है। यही मजीठिया के लिए सबसे बड़ी परीक्षा है।
समर्थक बनाम आलोचक

मजीठिया के समर्थक उन्हें—
- निडर
- जुझारू
- पार्टी के लिए लड़ने वाला नेता
मानते हैं।
वहीं आलोचक कहते हैं कि—
- विवाद उनकी सबसे बड़ी कमजोरी हैं
- उनका नाम पार्टी की छवि को नुकसान पहुंचाता है
- नई राजनीति में ऐसे चेहरों की स्वीकार्यता घट रही है
यही टकराव उन्हें लगातार सुर्खियों में रखता है।
मीडिया और पब्लिक इमेज
मजीठिया की मीडिया इमेज हमेशा दो हिस्सों में बंटी रही है। कुछ चैनलों और अखबारों में वह मजबूत विपक्षी नेता दिखते हैं, तो कहीं विवादों से घिरे चेहरे के रूप में पेश किए जाते हैं।
लेकिन एक बात तय है—मजीठिया खबर बनते हैं, चाहे हालात कुछ भी हों।
आगे की राह: खत्म नहीं हुआ अध्याय
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो BIKRAM SINGH MAJITHIA का अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है। अनुभव, नेटवर्क और संगठनात्मक पकड़—ये सब उनके पास मौजूद हैं।
सवाल सिर्फ यह है कि वह बदलते वक्त के साथ खुद को किस हद तक ढाल पाते हैं।
निष्कर्ष
BIKRAM SINGH MAJITHIA पंजाब की राजनीति का ऐसा नाम हैं जिसे न तो सिर्फ आरोपों से परिभाषित किया जा सकता है और न ही सिर्फ विरासत से। वह संघर्ष, प्रभाव और टकराव—तीनों का मिश्रण हैं।
समर्थकों के लिए वह अब भी भरोसेमंद नेता हैं, विरोधियों के लिए बड़ा टारगेट।
और शायद यही वजह है कि पंजाब की राजनीति में मजीठिया को नजरअंदाज करना आज भी मुमकिन नहीं है।
Bikram Singh Majithia को आय से अधिक मामले में Supreme Court ने जमानत | SAD#punjabpolitics #BikramSinghMajithia #SC pic.twitter.com/qa6l3VDsF2
— Punjab Kesari (@punjabkesari) February 2, 2026