नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति में कुछ पर्व ऐसे हैं जो केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि पूरे समाज की सोच, दिशा और चेतना को प्रभावित करते हैं। बसंत पंचमी (Basant Panchami) ऐसा ही एक पावन पर्व है, जो ज्ञान, विद्या, बुद्धि, संगीत और कला के प्रति श्रद्धा को समर्पित है। यह दिन माँ सरस्वती की उपासना का प्रतीक है, जिन्हें शब्द, स्वर और सृजन की देवी माना जाता है। taazanews24x7.com
हर वर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व, शीत ऋतु की विदाई और बसंत ऋतु के स्वागत का संदेश देता है। प्रकृति में नई ऊर्जा, खेतों में पीली सरसों, पेड़ों पर कोमल पत्तियाँ और वातावरण में उल्लास—सब कुछ मिलकर बसंत पंचमी को एक जीवंत उत्सव बना देता है।
बसंत पंचमी का आध्यात्मिक और धार्मिक आधार
हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार, माँ सरस्वती को ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। वे ब्रह्मा जी की शक्ति हैं और सृष्टि को चेतना प्रदान करती हैं। बिना ज्ञान के मनुष्य केवल जीव मात्र है, और माँ सरस्वती उसी ज्ञान का स्वरूप हैं जो मनुष्य को मानव बनाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सृष्टि की रचना के बाद चारों ओर मौन और जड़ता थी। तब ब्रह्मा जी के आदेश से माँ सरस्वती प्रकट हुईं और उन्होंने अपने वीणा के मधुर स्वर से संसार को भाषा, ध्वनि और अभिव्यक्ति प्रदान की। इसी कारण बसंत पंचमी को माँ सरस्वती के प्राकट्य दिवस के रूप में भी देखा जाता है।
बसंत ऋतु का आगमन और प्रकृति से जुड़ा संदेश
बसंत पंचमी केवल देवी पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव जीवन के सामंजस्य का पर्व भी है। इस दिन से बसंत ऋतु की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है।
बसंत ऋतु के संकेत
- खेतों में लहलहाती सरसों
- आम के पेड़ों पर बौर
- पक्षियों का मधुर कलरव
- मौसम में हल्की गर्माहट
यह सब संकेत देते हैं कि जीवन में फिर से उत्साह, प्रेम और सृजन का समय आ गया है।
पीले रंग का विशेष महत्व
बसंत पंचमी पर पीले रंग का विशेष स्थान है। लोग पीले वस्त्र पहनते हैं, पीले फूल चढ़ाते हैं और पीले व्यंजन बनाते हैं।
पीला रंग दर्शाता है:
- ज्ञान और बुद्धि
- सकारात्मक ऊर्जा
- समृद्धि और आशा
- सूर्य की दिव्य शक्ति
धार्मिक मान्यता के अनुसार, पीला रंग माँ सरस्वती को अत्यंत प्रिय है।

सरस्वती पूजा विधि: श्रद्धा और शुद्धता का संगम
बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा विधिपूर्वक की जाती है। विशेष रूप से विद्यार्थी और शिक्षक इस पूजा को बड़े भाव से करते हैं।
पूजा की तैयारी
- प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना
- पूजा स्थल को साफ कर पीले वस्त्र से सजाना
- माँ सरस्वती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करना
पूजा सामग्री
- पीले फूल
- चंदन, हल्दी, अक्षत
- दीपक, धूप
- पुस्तकें, कॉपी, कलम
- वीणा या वाद्य यंत्र
पूजा का महत्व
इस दिन पुस्तकों और लेखन सामग्री को छूना नहीं चाहिए, बल्कि उनकी पूजा करनी चाहिए। यह परंपरा ज्ञान के प्रति सम्मान को दर्शाती है।
विद्यारंभ संस्कार और बसंत पंचमी
हिंदू परंपरा में विद्यारंभ संस्कार का अत्यंत महत्व है। माना जाता है कि बसंत पंचमी के दिन बच्चे को पहली बार अक्षर ज्ञान देना शुभ होता है।
आज भी कई परिवार इस दिन:
- बच्चों को पहली बार लिखना सिखाते हैं
- शिक्षा की नई शुरुआत करते हैं
- प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू करते हैं
छात्रों, शिक्षकों और कलाकारों के लिए विशेष पर्व
बसंत पंचमी का उत्साह सबसे अधिक:
- विद्यार्थियों
- शिक्षकों
- संगीतकारों
- लेखकों
- चित्रकारों
- नृत्य कलाकारों
में देखने को मिलता है।
देशभर के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सरस्वती पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रम, कवि सम्मेलन और संगीत आयोजन किए जाते हैं।
भारत के विभिन्न राज्यों में बसंत पंचमी की विविध परंपराएँ
पश्चिम बंगाल
यहाँ बसंत पंचमी को श्री पंचमी कहा जाता है। कोलकाता में इसे दुर्गा पूजा के बाद दूसरा सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है।
उत्तर प्रदेश और बिहार
सरस्वती पूजा यहाँ सामूहिक रूप से होती है। गाँवों और शहरों में पंडाल सजाए जाते हैं।
पंजाब और हरियाणा
बसंत पंचमी पर पतंग उड़ाने की परंपरा है, जो जीवन की ऊँचाइयों को छूने का प्रतीक मानी जाती है।
दक्षिण भारत
तमिलनाडु और कर्नाटक में इसे शिक्षा से जोड़कर देखा जाता है और विद्यारंभ संस्कार किया जाता है।
बसंत पंचमी और भारतीय साहित्य व कला
भारतीय साहित्य, संगीत और शास्त्रीय कला में माँ सरस्वती की आराधना सदियों से होती आ रही है। कालिदास से लेकर आधुनिक कवियों तक, सभी ने बसंत ऋतु और सरस्वती की महिमा का वर्णन किया है।
बसंत पंचमी:
- रचनात्मक सोच को बढ़ावा देती है
- कला को सामाजिक सम्मान दिलाती है
- संस्कृति को जीवंत बनाए रखती है
आधुनिक युग में बसंत पंचमी का महत्व
आज के डिजिटल और तकनीकी युग में भी बसंत पंचमी की प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। बल्कि यह पर्व हमें याद दिलाता है कि:
- केवल जानकारी नहीं, सही ज्ञान जरूरी है
- शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण है
- विवेक और नैतिकता के बिना प्रगति अधूरी है
सोशल मीडिया और इंटरनेट के दौर में माँ सरस्वती की उपासना हमें सत्य, संयम और संतुलन का संदेश देती है।

Happy Basant Panchami 2026: शुभकामनाओं का आदान-प्रदान
बसंत पंचमी के अवसर पर लोग:
- शुभकामना संदेश भेजते हैं
- सोशल मीडिया पर पीले थीम के पोस्ट साझा करते हैं
- परिवार और मित्रों के साथ पूजा करते हैं
यह पर्व समाज में सकारात्मक ऊर्जा और आपसी सौहार्द को बढ़ाता है।
निष्कर्ष
बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और चेतना का उत्सव है। यह पर्व हमें सिखाता है कि शिक्षा और विवेक ही व्यक्ति और समाज को ऊँचाइयों तक ले जाते हैं।
माँ सरस्वती की कृपा से हर व्यक्ति के जीवन में:
- ज्ञान का प्रकाश
- सफलता की दिशा
- और शांति का वास
बना रहे—इसी मंगलकामना के साथ—
आप सभी को Happy Basant Panchami 2026 और Saraswati Puja की हार्दिक शुभकामनाएँ।
FAQ:
Q1. बसंत पंचमी 2026 कब मनाई जाएगी?
बसंत पंचमी 2026 माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाएगी। इस दिन सरस्वती पूजा का विशेष महत्व होता है।
Q2. बसंत पंचमी क्यों मनाई जाती है?
बसंत पंचमी ज्ञान, विद्या, संगीत और कला की देवी माँ सरस्वती को समर्पित पर्व है। यह बसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है।
Q3. सरस्वती पूजा का क्या महत्व है?
सरस्वती पूजा से बुद्धि, एकाग्रता, रचनात्मकता और शिक्षा में सफलता की प्राप्ति होती है। विद्यार्थी इस दिन विशेष पूजा करते हैं।
Q5. बसंत पंचमी पर पीले रंग का क्या महत्व है?
पीला रंग ज्ञान, समृद्धि, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक है। माँ सरस्वती को पीला रंग अत्यंत प्रिय माना जाता है।
Q6. क्या बसंत पंचमी पर पढ़ाई शुरू करना शुभ होता है? हां, बसंत पंचमी को विद्यारंभ संस्कार के लिए सबसे शुभ दिन माना जाता है।
