Bombay High Court:  महायुति के 66 पार्षदों की निर्विरोध जीत पर सियासी तूफान MNS का गंभीर आरोप—“5 से 8 करोड़ में हुई सौदेबाजी”; आज Bombay High Court में होगी अहम सुनवाई

लोकतंत्र की जीत या लोकतंत्र के साथ सौदा?

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है। स्थानीय निकाय चुनावों में महायुति गठबंधन के 66 पार्षदों का निर्विरोध चुना जाना सत्तापक्ष इसे अपनी संगठनात्मक ताकत और राजनीतिक पकड़ का प्रमाण बता रहा है, लेकिन विपक्ष की नजर में यह तस्वीर उतनी साफ नहीं है। taazanews24x7.com

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने इस जीत को जनादेश नहीं, बल्कि लोकतंत्र के साथ किया गया सौदा करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि यह निर्विरोध सफलता मतदाताओं की सहमति से नहीं, बल्कि 5 से 8 करोड़ रुपये तक की कथित सौदेबाजी, दबाव और भय के माहौल के जरिए हासिल की गई।

इन्हीं गंभीर आरोपों को लेकर MNS ने अब इस मामले को Bombay High Court की दहलीज तक पहुंचा दिया है।
यह विवाद सिर्फ हार-जीत या सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस बुनियादी सवाल को जन्म देता है—
क्या स्थानीय लोकतंत्र अब पैसे, ताकत और समझौतों का खेल बनता जा रहा है?

क्या है पूरा मामला?

स्थानीय निकाय चुनावों की प्रक्रिया के दौरान उस वक्त सियासी पारा अचानक चढ़ गया, जब यह जानकारी सामने आई कि महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन के 66 उम्मीदवार बिना किसी मुकाबले के पार्षद घोषित कर दिए गए।
निर्विरोध चुनाव कानूनन संभव है, लेकिन जब इतनी बड़ी संख्या में एक ही गठबंधन के उम्मीदवारों को बिना वोटिंग के जीत मिलती है, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठने लगते हैं—और यहीं से यह विवाद सियासी बहस से निकलकर संवैधानिक जांच की ओर बढ़ गया।

निर्विरोध चुनाव का अर्थ है—

किसी सीट पर केवल एक ही वैध उम्मीदवार बचता है और उसे बिना मतदान के विजेता घोषित कर दिया जाता है।

सैद्धांतिक रूप से यह पूरी तरह कानूनी प्रक्रिया है। लेकिन विवाद तब खड़ा होता है जब इतनी बड़ी संख्या में, एक ही गठबंधन के उम्मीदवारों का निर्विरोध चुना जाना सामने आता है।

यही वह बिंदु है, जहां MNS ने सवाल खड़े किए हैं।

MNS का दावा: “यह संयोग नहीं, सोची-समझी रणनीति है”

MNS नेताओं का कहना है कि 66 सीटों पर विपक्ष का एक भी उम्मीदवार मैदान में न होना किसी भी तरह से सामान्य नहीं हो सकता। पार्टी का आरोप है कि:

  • विपक्षी उम्मीदवारों पर नामांकन वापस लेने का दबाव डाला गया
  • कई जगहों पर पैसे की पेशकश की गई
  • कुछ क्षेत्रों में डर और प्रशासनिक दबाव का माहौल बनाया गया
  • पूरी प्रक्रिया चुनाव से पहले तय की गई डील का हिस्सा थी

MNS का सबसे बड़ा आरोप यही है कि इन सीटों पर 5 से 8 करोड़ रुपये तक की कथित लेन-देन हुई, ताकि महायुति को बिना चुनाव लड़े जीत दिलाई जा सके।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के शब्दों में—

“यह राजनीति नहीं, खुली खरीद-फरोख्त है। जब चुनाव ही न हो, तो जनता की भूमिका कहां बचती है?”

Bombay High Court में आज क्या होगा?

MNS इस पूरे मामले को लेकर Bombay High Court में याचिका दायर कर रही है। याचिका में कई अहम मांगें रखी गई हैं:

याचिका की प्रमुख मांगें:

  1. 66 निर्विरोध जीतों की स्वतंत्र न्यायिक जांच कराई जाए
  2. यह स्पष्ट किया जाए कि—
    • उम्मीदवारों ने नामांकन क्यों वापस लिए
    • क्या नामांकन स्वेच्छा से या दबाव में वापस लिए गए
  3. राज्य चुनाव आयोग और राज्य सरकार से जवाब तलब किया जाए
  4. अगर अनियमितता साबित होती है, तो
    • इन निर्विरोध जीतों को अमान्य घोषित किया जाए

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोर्ट को प्रथम दृष्टया अनियमितता के संकेत मिलते हैं, तो यह मामला सिर्फ याचिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे चुनावी सिस्टम की जांच का रास्ता खोल सकता है।

महायुति की प्रतिक्रिया: “बिना सबूत राजनीतिक ड्रामा”

महायुति गठबंधन ने MNS के आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद और राजनीतिक हताशा करार दिया है। गठबंधन नेताओं का कहना है:

  • “हमारी जमीनी पकड़ मजबूत है”
  • “विपक्ष जानता था कि उसकी हार तय है, इसलिए उसने उम्मीदवार ही नहीं उतारे”
  • “पैसों के आरोप सिर्फ सुर्खियों में बने रहने का तरीका हैं”

महायुति का यह भी कहना है कि—

“अगर MNS के पास कोई ठोस सबूत हैं, तो उन्हें कोर्ट में पेश करे। लोकतंत्र सड़कों पर शोर से नहीं, कानून से चलता है।”

निर्विरोध चुनाव: कानून क्या कहता है?

भारतीय चुनाव कानून के तहत निर्विरोध चुनाव पूरी तरह वैध प्रक्रिया है। नियमों के अनुसार:

  • यदि किसी सीट पर एक ही वैध उम्मीदवार रह जाता है
  • और बाकी उम्मीदवार अपना नामांकन वापस ले लेते हैं
  • तो उस उम्मीदवार को निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया जाता है

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यह साबित हो जाए कि:

  • नामांकन पैसे, दबाव या धमकी के कारण वापस लिए गए
  • या उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से अनुचित रूप से रोका गया

ऐसी स्थिति में यह माना जा सकता है:

  • चुनावी भ्रष्टाचार
  • जनप्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन

और यही वह कानूनी आधार है, जिस पर MNS अपनी याचिका टिका रही है।

स्थानीय राजनीति में पैसों की भूमिका: कड़वी सच्चाई

यह कोई छिपा हुआ तथ्य नहीं है कि देशभर में स्थानीय निकाय चुनाव अब केवल “सेवा” का माध्यम नहीं रह गए हैं।
नगर निगम, नगर परिषद और जिला परिषद जैसे संस्थान आज—

  • बड़े बजट
  • ठेके
  • स्थानीय विकास योजनाएं
  • राजनीतिक पकड़

का प्रवेश द्वार बन चुके हैं।

इसी वजह से:

  • कई जगहों पर पार्षद पद की कीमत करोड़ों में आंकी जाने लगी है
  • निर्विरोध जीत को सत्ता हथियाने का सबसे आसान तरीका माना जाने लगा है

MNS का आरोप इसी सच्चाई की ओर इशारा करता है—हालांकि अब यह अदालत तय करेगी कि आरोपों में कितना दम है।

राजनीतिक मायने: MNS बनाम महायुति

यह विवाद सिर्फ 66 सीटों तक सीमित नहीं है। इसके दूरगामी राजनीतिक असर हो सकते हैं:

  • MNS खुद को “सिस्टम के खिलाफ लड़ने वाली पार्टी” के रूप में पेश करना चाहती है
  • महायुति अपनी संगठनात्मक ताकत और राजनीतिक प्रभुत्व दिखा रही है
  • आगामी चुनावों से पहले नैरेटिव की जंग तेज हो गई है

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि—

“अगर कोर्ट ने जांच के आदेश दिए, तो यह महाराष्ट्र की राजनीति में बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।”

चुनाव आयोग की भूमिका पर भी उठे सवाल

इस पूरे विवाद में एक अहम सवाल यह भी है कि—

  • चुनाव आयोग की निगरानी कहां थी?
  • इतनी बड़ी संख्या में निर्विरोध जीतों पर
  • क्या कोई विशेष रिपोर्ट या समीक्षा की गई?

नियमों के अनुसार, चुनाव आयोग आमतौर पर तभी हस्तक्षेप करता है जब औपचारिक शिकायत दर्ज हो। अब जब मामला हाई कोर्ट पहुंच चुका है, तो संभव है कि आयोग से भी जवाब मांगा जाए।

जनता की नजर में क्या संदेश जा रहा है?

इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा नुकसान जनविश्वास को होता है। आम मतदाता पूछ रहा है:

  • “अगर चुनाव लड़ने का मौका ही नहीं मिला, तो वोट किस बात का?”
  • “क्या स्थानीय लोकतंत्र सिर्फ ताकतवरों का खेल बन गया है?”

ये सवाल किसी एक पार्टी के नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक सिस्टम के लिए चेतावनी हैं।

आगे क्या?

अब सबकी निगाहें Bombay High Court की सुनवाई पर टिकी हैं। संभावनाएं कई हैं:

  1. कोर्ट प्रारंभिक सुनवाई के बाद
    • सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगे
  2. तथ्यों के अभाव में
    • याचिका खारिज कर दी जाए
  3. या फिर
    • स्वतंत्र जांच के आदेश दिए जाएं

तीनों ही स्थितियों में महाराष्ट्र की राजनीति पर इसका असर तय है।

निष्कर्ष: लोकतंत्र की असली परीक्षा

महायुति के 66 पार्षदों की निर्विरोध जीत—

  • एक ओर राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन हो सकती है
  • तो दूसरी ओर लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गहरे सवाल भी

MNS का 5–8 करोड़ की सौदेबाजी का आरोप गंभीर है, लेकिन भारतीय कानून में फैसला आरोपों पर नहीं, सबूतों पर होता है।

अब यह मामला न सड़कों पर तय होगा,
न सोशल मीडिया पर,
बल्कि Bombay High Court के न्यायिक विवेक पर।

और शायद यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत भी है।

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