Yami Gautam–Emraan Hashmi की कोर्टरूम ड्रामा फिल्म ने क्यों छेड़ा इंसाफ पर नया विमर्श?
नया साल, नई उम्मीदें और भारतीय सिनेमा में एक ऐसी फिल्म, जो बिना शोर किए अपनी बात कह गई। ‘Haq’ किसी बड़े फ्रैंचाइज़ी का हिस्सा नहीं है, न ही इसमें आइटम सॉन्ग या ओवर-द-टॉप ड्रामा है। फिर भी, 2026 की शुरुआत में यह फिल्म दर्शकों के बीच चर्चा का विषय बन गई है। taazanews24x7.com
थिएटर में एक सधी हुई, गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली फिल्म के तौर पर पहचान बनाने के बाद अब ‘Haq’ OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज हो चुकी है। और दिलचस्प बात यह है कि OTT पर आते ही फिल्म को एक नई ऑडियंस मिल गई है—वह दर्शक, जो शायद थिएटर तक न पहुंच पाए हों, लेकिन मजबूत कंटेंट की तलाश में रहते हैं।

थिएटर में चुपचाप आई, लेकिन असर गहरा छोड़ गई
‘Haq’ जब सिनेमाघरों में रिलीज हुई, तो यह किसी त्योहार या बड़े बॉक्स ऑफिस क्लैश का हिस्सा नहीं थी। प्रचार भी सीमित था। लेकिन पहले ही वीकेंड के बाद यह साफ हो गया कि फिल्म धीमी रफ्तार से सही, लेकिन मजबूत पकड़ बना रही है।
दर्शकों की बातचीत में फिल्म के डायलॉग्स, कोर्टरूम सीन और Yami Gautam की परफॉर्मेंस बार-बार सामने आने लगी।
यह वही फिल्म थी, जिसे देखकर लोग थिएटर से निकलते वक्त मोबाइल नहीं, बल्कि एक-दूसरे से बात करते नजर आए।
अब OTT पर ‘हक’: कहां और कब देखें फिल्म?
थिएटर रन के बाद अब ‘हक’ ने OTT की दुनिया में कदम रख दिया है।
- OTT प्लेटफॉर्म: Netflix
- रिलीज: जनवरी 2026 का पहला शुक्रवार
- अवधि: 2 घंटे 16 मिनट
- जॉनर: कोर्टरूम ड्रामा / सोशल थ्रिलर
नेटफ्लिक्स पर रिलीज होते ही फिल्म को लेकर चर्चा फिर से तेज हो गई। खासकर उन दर्शकों के बीच, जो लंबे समय से किसी ठोस, गंभीर और वास्तविक कहानी की तलाश में थे।

कहानी: जब केस सिर्फ फाइल नहीं, जिंदगी बन जाता है
‘Haq’ की कहानी किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। यह उन अनगिनत मामलों की गूंज है, जो अदालतों की फाइलों में दब जाते हैं।
फिल्म एक ऐसे कानूनी संघर्ष को दिखाती है, जहां सवाल सिर्फ कानून की धाराओं का नहीं, बल्कि इंसान की गरिमा और आत्मसम्मान का है।
यहां अदालत सिर्फ जज और वकीलों की जगह नहीं, बल्कि एक ऐसा मंच बन जाती है, जहां सच और ताकत आमने-सामने खड़े होते हैं।
फिल्म बार-बार यह सवाल उठाती है—
क्या हर सही इंसान के पास लड़ने की ताकत होती है, या ‘Haq’ सिर्फ उन्हीं को मिलता है जो सिस्टम को समझते हैं?
Yami Gautam: बिना शोर, पूरी ताकत के साथ
Yami Gautam ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह की फिल्में चुनी हैं, उसने उन्हें एक भरोसेमंद अभिनेत्री बना दिया है। ‘हक’ में उनका किरदार किसी आदर्शवादी हीरोइन का नहीं, बल्कि एक ऐसी वकील का है, जो खुद भी सिस्टम की सीमाओं को समझती है।
उनका अभिनय न तो भाषणबाज़ी करता है और न ही भावनाओं का प्रदर्शन।
कोर्टरूम में उनके तर्क, चेहरे के हावभाव और खामोश पल—सब मिलकर यह अहसास कराते हैं कि यह किरदार कागज पर नहीं, जमीन पर लिखा गया है।
कई सीन ऐसे हैं, जहां यामी बिना संवाद के ही पूरा भाव रख देती हैं—और यही अभिनय की असली ताकत है।
Emraan Hashmi: बोलते कम, कहते ज्यादा
Emraan Hashmi की इस फिल्म में मौजूदगी चौंकाती नहीं, बल्कि धीरे-धीरे असर करती है।
वह नायक नहीं बनते, न ही खुद को सही साबित करने की कोशिश करते हैं।
उनका किरदार उस आम आदमी का प्रतिनिधित्व करता है, जो—
- सिस्टम से टकराना चाहता है
- लेकिन हर मोड़ पर कमजोर पड़ जाता है
- फिर भी अंदर कहीं हार मानने से इनकार करता है
OTT दर्शकों के बीच Emraan Hashmi की यह परफॉर्मेंस खास सराहना बटोर रही है, क्योंकि यह शोर नहीं मचाती—बस सच कहती है।

कोर्टरूम ड्रामा, लेकिन फिल्मी नहीं
‘Haq’ की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह कोर्टरूम ड्रामा होते हुए भी फिल्मी नहीं लगती।
यहां कोई अचानक चीखता नहीं, कोई टेबल नहीं पीटता, कोई फैसले को नाटकीय नहीं बनाता।
यह फिल्म दिखाती है—
- कानूनी प्रक्रिया की धीमी सच्चाई
- तारीखों का बोझ
- और फैसले का इंतजार
यही वजह है कि दर्शक खुद को कहानी से जोड़ पाते हैं।
2 घंटे 16 मिनट: क्यों नहीं खलता समय?
आज के दौर में जहां दर्शक 30 सेकंड की रील में फैसला कर लेते हैं, वहां 2 घंटे 16 मिनट की फिल्म जोखिम भरी मानी जाती है।
लेकिन ‘हक’ का स्क्रीनप्ले दर्शक को बांधे रखता है।
- कोई गैरजरूरी गाना नहीं
- कोई भटकाव नहीं
- हर सीन कहानी को आगे बढ़ाता है
फिल्म खत्म होने पर यह एहसास नहीं होता कि समय ज्यादा लगा—बल्कि यह लगता है कि कहानी अधूरी न छूटे।
OTT पर मिली नई जिंदगी
थिएटर में सीमित दर्शकों तक पहुंचने के बाद OTT ने ‘Haq’ को दूसरा मौका दिया है।
अब यह फिल्म उन घरों तक पहुंच रही है, जहां शायद लोग थिएटर नहीं जा पाए, लेकिन अच्छी कहानी देखना चाहते हैं।
नेटफ्लिक्स पर फिल्म को लेकर खासतौर पर—
- लॉ स्टूडेंट्स
- यंग प्रोफेशनल्स
- और कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा पसंद करने वाले दर्शक
अच्छी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
साल के पहले फ्राइडे का खास कंटेंट
2026 के पहले शुक्रवार को OTT प्लेटफॉर्म्स पर कई रिलीज हुईं। कहीं ग्लैमर था, कहीं थ्रिल, कहीं हल्की-फुल्की कॉमेडी।
लेकिन ‘Haq’ उन सबके बीच अलग खड़ी नजर आई।
यह फिल्म वीकेंड एंटरटेनमेंट नहीं, बल्कि वीकेंड रिफ्लेक्शन बन गई।
सोशल मीडिया पर चर्चा क्यों?
‘Haq’ को लेकर सोशल मीडिया पर जो चर्चा हो रही है, वह ट्रेंड्स से ज्यादा भावनाओं पर आधारित है।
लोग लिख रहे हैं—
- “ऐसी फिल्में ज्यादा बननी चाहिए”
- “यह कहानी हमारी भी हो सकती है”
- “अदालत सिर्फ जगह नहीं, उम्मीद भी है”
यह वही प्रतिक्रिया है, जो किसी कंटेंट-ड्रिवन फिल्म की असली सफलता मानी जाती है।
क्यों जरूरी है ‘Haq’ जैसी फिल्में?
आज जब सिनेमा तेजी से उपभोग की चीज बनता जा रहा है, ‘हक’ जैसी फिल्में याद दिलाती हैं कि—
- सिनेमा सवाल भी उठा सकता है
- सिस्टम को आईना दिखा सकता है
- और बिना चिल्लाए बात कह सकता है
यह फिल्म किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करती, बस दर्शक को सोचने का मौका देती है।
निष्कर्ष: ‘Haq’ एक फिल्म नहीं, अनुभव है
‘Haq’ देखकर यह महसूस होता है कि इंसाफ सिर्फ फैसला नहीं, एक लंबी प्रक्रिया है।
यह फिल्म बताती है कि—
हक मांगने से नहीं, लड़ने से मिलता है।
थिएटर में जिसने अपनी सादगी से दर्शकों को जीता, वही फिल्म अब OTT पर भी मजबूती से खड़ी है।
अगर आप इस वीकेंड कुछ ऐसा देखना चाहते हैं, जो खत्म होने के बाद भी आपके साथ रहे—तो नेटफ्लिक्स पर ‘Haq’ जरूर देखें।
Most period movies are either about Kings, Battles, Wars or Massacres. But some events that happen inside the four walls have a bigger impact, Shah Bano judgment in 1986 was one. The movie #Haq tells the story. A shameful time when the Indian state let the most intolerant win.… pic.twitter.com/FGnqjSCWE5
— Gabbar (@GabbbarSingh) November 23, 2025