कर्नाटक की राजनीति से एक बेहद दुखद और अपूरणीय क्षति की खबर सामने आई है। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता, सात बार विधायक रह चुके, पूर्व मंत्री और दावणगेरे क्षेत्र की राजनीति का मजबूत स्तंभ माने जाने वाले शमनूर शिवशंकरप्पा का निधन हो गया। उनके निधन की खबर सामने आते ही न केवल कांग्रेस पार्टी, बल्कि पूरे कर्नाटक के राजनीतिक, सामाजिक और औद्योगिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई। taazanews24x7.com
शमनूर शिवशंकरप्पा सिर्फ एक नेता नहीं थे, बल्कि वे राजनीति में निरंतरता, अनुभव और जमीनी जुड़ाव का प्रतीक थे। दशकों तक सक्रिय राजनीति में रहने के बावजूद उन्होंने कभी अपनी सादगी, विचारधारा और जनता के प्रति जिम्मेदारी से समझौता नहीं किया।

राजनीतिक सफर की शुरुआत: जमीन से जुड़ा नेता
शमनूर शिवशंकरप्पा का राजनीतिक जीवन किसी चमक-दमक से शुरू नहीं हुआ। उन्होंने राजनीति की शुरुआत जमीनी स्तर से की और धीरे-धीरे जनता के विश्वास के बल पर आगे बढ़ते गए। उनका मानना था कि राजनीति का असली अर्थ लोगों की समस्याओं को समझना और उनका समाधान निकालना है।
दावणगेरे जैसे औद्योगिक और श्रमिक बहुल क्षेत्र में राजनीति करना आसान नहीं था। यहां मजदूर, व्यापारी, किसान और युवा—सभी की अपेक्षाएं अलग-अलग थीं। लेकिन शिवशंकरप्पा ने हर वर्ग से संवाद स्थापित कर खुद को सर्वस्वीकार्य नेता के रूप में स्थापित किया।
सात बार विधायक: जनता के भरोसे की मिसाल
किसी भी लोकतंत्र में बार-बार चुना जाना जनता के भरोसे की सबसे बड़ी कसौटी होती है। शमनूर शिवशंकरप्पा का सात बार विधायक चुना जाना इस बात का प्रमाण है कि जनता ने उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि अपना प्रतिनिधि माना।
उनकी चुनावी जीतें केवल पार्टी या संगठन की जीत नहीं थीं, बल्कि उनके व्यक्तिगत कार्य, पहुंच और विश्वसनीयता का नतीजा थीं। विरोधी भी उनकी चुनावी रणनीति और जनसंपर्क की क्षमता की सराहना करते थे।
कांग्रेस पार्टी में भूमिका: संकटमोचक नेता
कर्नाटक कांग्रेस के भीतर शमनूर शिवशंकरप्पा की भूमिका हमेशा संतुलन बनाने वाले नेता की रही। जब भी पार्टी आंतरिक मतभेदों या चुनावी असफलताओं से जूझी, तब शिवशंकरप्पा जैसे वरिष्ठ नेताओं ने संगठन को संभालने का काम किया।
वे न तो गुटबाजी की राजनीति में विश्वास रखते थे और न ही सार्वजनिक मंचों पर विवाद को बढ़ावा देते थे। उनकी पहचान एक ऐसे नेता की थी जो पर्दे के पीछे रहकर भी बड़े फैसलों को आकार देने की क्षमता रखता था।

मंत्री पद पर रहते हुए विकास की ठोस छाप
अपने मंत्री कार्यकाल के दौरान शमनूर शिवशंकरप्पा ने केवल योजनाओं की घोषणा तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि उनके क्रियान्वयन पर भी बराबर नजर रखी।
विशेष रूप से:
- कपड़ा उद्योग को बढ़ावा
- स्थानीय रोजगार सृजन
- श्रमिकों के कल्याण की योजनाएं
- छोटे और मध्यम उद्योगों का संरक्षण
इन क्षेत्रों में उनके योगदान को आज भी दावणगेरे और आसपास के इलाकों में महसूस किया जा सकता है। दावणगेरे को कर्नाटक के प्रमुख टेक्सटाइल हब के रूप में पहचान दिलाने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही।
मजदूरों और उद्योगपतियों के बीच सेतु
राजनीति में अक्सर उद्योगपति और मजदूर दो अलग-अलग ध्रुवों पर खड़े नजर आते हैं, लेकिन शमनूर शिवशंकरप्पा उन चुनिंदा नेताओं में थे जो दोनों के बीच संतुलन बना पाए।
उन्होंने उद्योगों को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा पर भी जोर दिया। यही कारण है कि वे फैक्ट्री मालिकों के साथ-साथ मजदूर संगठनों में भी सम्मान के साथ देखे जाते थे।
सादगी भरा जीवन, मजबूत नैतिकता
लंबे राजनीतिक करियर के बावजूद शमनूर शिवशंकरप्पा का निजी जीवन बेहद साधारण रहा। न भव्य बंगलों का शौक, न ही दिखावटी सुरक्षा काफिले की चाह। वे अक्सर बिना किसी औपचारिकता के जनता के बीच पहुंच जाते थे।
उनकी यही सादगी उन्हें आम नेताओं से अलग बनाती थी। राजनीति में जहां अक्सर आरोप-प्रत्यारोप और वैभव हावी रहता है, वहीं शिवशंकरप्पा का जीवन ईमानदारी और मर्यादा का उदाहरण था।
दावणगेरे से विशेष भावनात्मक रिश्ता
दावणगेरे केवल उनका निर्वाचन क्षेत्र नहीं था, बल्कि उनका कर्मक्षेत्र और पहचान भी था। उन्होंने इस क्षेत्र के विकास के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और उद्योग—हर क्षेत्र में काम किया।
स्थानीय लोगों के लिए वे एक ऐसे नेता थे, जिनके दरवाजे कभी बंद नहीं होते थे। चाहे व्यक्तिगत समस्या हो या सामूहिक मुद्दा, लोग बेझिझक उनके पास पहुंचते थे।
विपक्ष में रहते हुए भी रचनात्मक राजनीति
शमनूर शिवशंकरप्पा की खासियत यह थी कि वे विपक्ष में रहते हुए भी सिर्फ आलोचना तक सीमित नहीं रहते थे। वे मुद्दों पर आधारित राजनीति करते थे और सरकार को सुझाव देने से भी पीछे नहीं हटते थे।
विधानसभा में उनके भाषण तथ्यात्मक, संतुलित और समाधान केंद्रित होते थे। यही वजह है कि उनके विचारों को सत्ता पक्ष भी गंभीरता से सुनता था।
निधन से कर्नाटक की राजनीति में शून्य
उनके निधन से कर्नाटक की राजनीति में जो शून्य पैदा हुआ है, उसकी भरपाई आसान नहीं होगी। कांग्रेस पार्टी के लिए यह नुकसान इसलिए भी बड़ा है क्योंकि शिवशंकरप्पा जैसे नेता अनुभव और जमीन से जुड़े नेतृत्व का दुर्लभ संयोजन थे।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनके जाने से मध्य कर्नाटक की राजनीति में समीकरण बदल सकते हैं।
नेताओं और समाज ने दी श्रद्धांजलि
उनके निधन पर मुख्यमंत्री, कांग्रेस अध्यक्ष, पूर्व मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय नेताओं और यहां तक कि विपक्षी दलों के नेताओं ने भी शोक व्यक्त किया। सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि संदेशों की बाढ़ आ गई।
सभी ने उन्हें एक सभ्य, संतुलित और दूरदर्शी नेता के रूप में याद किया।
नई पीढ़ी के लिए सबक
आज की राजनीति में जहां त्वरित लोकप्रियता और आक्रामकता को सफलता का पैमाना माना जाने लगा है, वहीं शमनूर शिवशंकरप्पा का जीवन बताता है कि धैर्य, निरंतरता और जनता से जुड़ाव ही असली पूंजी है।
युवा नेताओं के लिए उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि लंबे समय तक राजनीति में टिके रहने के लिए चरित्र और कर्म दोनों मजबूत होने चाहिए।

एक नेता नहीं, एक संस्था
शमनूर शिवशंकरप्पा को केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि एक संस्था के रूप में देखा जाता था। उन्होंने राजनीति को व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी माना।
उनका जाना न केवल कांग्रेस के लिए, बल्कि भारतीय राजनीति के लिए भी एक बड़ा नुकसान है।
अंतिम विदाई, अमर विरासत
आज शमनूर शिवशंकरप्पा हमारे बीच भले न हों, लेकिन उनके विचार, कार्य और योगदान हमेशा जीवित रहेंगे। कर्नाटक की राजनीति में उनका नाम सम्मान और आदर के साथ लिया जाता रहेगा।
उनका जीवन इस बात की गवाही देता है कि सच्ची राजनीति शोर से नहीं, बल्कि सेवा से बनती है।