दिल्ली: 9 दिसंबर 2025 को Rouse Avenue Court, दिल्ली ने कांग्रेस नेता Sonia Gandhi को एक याचिका पर नोटिस जारी किया — आरोप है कि उनका नाम वर्ष 1980-81 की मतदाता सूची (voter list / electoral roll) में था, जबकि उन्होंने औपचारिक रूप से भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को प्राप्त की थी।
यह मामला इसलिए सुर्खियों में आया है क्योंकि मतदाता सूची में नाम दर्ज होना केवल भारतीय नागरिकों के लिए वैध है; यदि यह पाया गया कि Sonia Gandhi ने नागरिकता से पहले अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराया था, तो यह एक संवैधानिक और कानूनी उल्लंघन हो सकता है — संभवतः धोखाधड़ी (forgery), मतदाता घोटाले या चुनावी अनियमितता (electoral malpractice) का मामला। taazanews24x7.com

पृष्ठभूमि: विवाद कैसे शुरू हुआ
1. याचिका और मुख्य आरोप
- याचिकाकर्ता (Vikas Tripathi) ने दिल्ली की अदालत में एक याचिका दाखिल की, जिसमें कहा गया कि Sonia Gandhi का नाम 1980 की मतदाता सूची (New Delhi निर्वाचन क्षेत्र / New Delhi parliamentary constituency) में था।
- लेकिन Sonia Gandhi को भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को मिली थी।)याचिकाकर्ता का दावा है कि 1980 में नामांकन के समय नागरिकता नहीं थी; इसलिए यह नामांकन असंगत और अवैध था — यह रहस्य है कि किस दस्तावेज़ (residential proof, passport, identity certificate आदि) के आधार पर नाम दर्शाया गया।
- याचिका में यह भी कहा गया कि 1982 में उनका नाम मतदाता सूची से हटाया गया और 1983 में दोबारा शामिल हुआ. यह पुनः नामांकन — जब नागरिकता मिल चुकी थी — भी संदिग्ध है।
- वकील दलील दे रहे हैं कि इस प्रकार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए फर्जी दस्तावेज़ (forgeries) उपयोग किए गए होंगे — अर्थात् धोखाधड़ी व सार्वजनिक प्राधिकरण (election authority) को छलपूर्वक धोखा देना।
2. कानूनी दायरा — मतदाता सूची और नागरिकता
- प्रतिपादित है कि मतदाता सूची में नाम तभी होना चाहिए जब व्यक्ति भारतीय नागरिक हो। यह प्रावधान संविधान व कानून (Representation of the People Act, 1950) के अनुसार है, विशेष रूप से धारा 16(1)(a) के तहत।
- यदि किसी गैर-नागरिक का नाम मतदाता सूची में शामिल किया गया, तो यह कानूनन अवैध होगा; और यदि दस्तावेज़ जाली थे, तो यह अपराध बन सकता है — जैसे कि धोखाधड़ी (cheating), forging public records आदि। याचिका में इसी आधार पर पुलिस से प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की मांग की गई।
इसलिए, दलील यह है कि — चाहे नाम 1980 में शामिल हुआ हो या 1983 में — पहली स्थिति (1980) पूरी तरह अवैध थी, जब नागरिकता नहीं थी; और पुनः नामांकन (1983 में) भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि उसे सही प्रक्रिया से क्यों नहीं जोड़ा गया, यह स्पष्ट नहीं है।
कोर्ट की कार्रवाई और मौजूदा स्थिति
1. पहली सुनवाई और खारिज याचिका
- सबसे पहले Complaint (शिकायत) दाखिल की गई थी; जिसे मजिस्ट्रेट अदालत अधीन (ACMM) Rouse Avenue Courts — न्यायाधीश Vaibhav Chaurasia के समक्ष — 11 सितंबर 2025 को खारिज कर दिया गया। अदालत का कहना था कि इस तरह की याचिका को स्वीकार करना उचित नहीं है, क्योंकि चुनाव संबंधी मामलों में सीधे एफआईआर करना संवैधानिक संस्थाओं (जैसे Election Commission of India) के अधिकार क्षेत्र में आ सकता है; प्रस्तावना के लिए पर्याप्त ठोस दलीलें नहीं थीं।
- फैसले में यह भी कहा गया कि याचिका के दावे — कि 1980 में नामांकन अवैध था — को साबित करने के लिए “आवश्यक अवयव” (fundamental ingredients) नहीं दिख रहे। यानी अदालत ने कहा कि दलील पर्याप्त नहीं थी कि धोखाधड़ी या फर्जीवाड़ा हुआ।
2. रिवीजन याचिका और नया नोटिस
- याचिकाकर्ता ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के फैसले के खिलाफ रिवीजन याचिका दायर की। इस याचिका पर देखते हुए, 9 दिसंबर 2025 को दिल्ली की Rouse Avenue Court ने फैसला किया कि इस मामले का पुनर्विचार किया जाए — और Sonia Gandhi तथा दिल्ली पुलिस दोनों को नोटिस जारी किया गया। अदालत ने कहा है कि मामले का पूरा रिकॉर्ड (TCR — Trial Court Record / case record) मंगाया जाए और अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 के लिए तय की गई है।
- अदालत ने कहा कि वकील द्वारा दायर दलीलें — कि दस्तावेज़ों में forgery हुआ होगा — पर्याप्त हैं कि मामले की समीक्षा की जाए। विशेष रूप से, शिकायत में कहा गया है कि “दस्तावेज संभवतः जाली, फर्जी, fabricated/falsified” थे।
- इसलिए, फिलहाल मामला बंद नहीं हुआ है — रिवीजन पिटीशन स्वीकार हो गई है और आगे सुनवाई होनी है।

दलीलें — पक्षों के मध्ये
याचिकाकर्ता & आरोप — क्या कहा गया है
- नागरिकता से पहले नामांकन: Sonia Gandhi ने 30 अप्रैल 1983 को भारतीय नागरिकता ली थी; उसके पहले (1980) वोटर सूची में उनका नाम था — यह नागरिकता-न्यूनता और मतदाता सूची में नामांकन के बीच स्पष्ट संघर्ष है।
- कानूनी उल्लंघन: मतदाता सूची में शामिल होने के लिए नागरिकता अनिवार्य है, जैसा कि Representation of the People Act, 1950 में लिखा है।
- नाम हटाया जाना और पुनर्स्थापना (1982–83): 1982 में नाम हटाया गया था, और 1983 में पुनः नाम जोड़ा गया, जब वे नागरिक बनी थीं। यह सवाल पैदा करता है कि 1980 में नामांकन सही था या नहीं।
- संभावित फर्जीवाड़ा / दस्तावेज़ों में धोखाधड़ी: याचिकाकर्ता का कहना है कि 1980 में मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए फर्जी दस्तावेज़ों का उपयोग हुआ होगा — जो कि चुनाव आयोग या मतदाता सूची तैयार करने वाले अधिकारियों के साथ धोखाधड़ी का मामला हो सकता है।
इस आधार पर, वे अदालत से पुलिस से प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने, मामले की जांच करने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग कर रहे हैं।
प्रतिवाद / बचाव — क्या कहा जा रहा है (या कहा जा सकता है)
- पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा था कि दलीलें पर्याप्त नहीं थीं; विशेष रूप से, आवश्यक अवयव (elements) — जैसे कि प्रमाण कि दस्तावेज़ फर्जी थे — नहीं दिखाए गए। (इसके अलावा, यह भी कहा गया था कि चुनाव संबंधी मामलों की जाँच सीधे अदालतों की बजाय संवैधानिक संस्थाओं / चुनाव आयोग की जिम्मेदारी हो सकती है; इसलिए एफआईआर दर्ज करना न्यायिक हस्तक्षेप हो सकता है।
- उनके पक्ष में यह कहा जा सकता है कि, यदि पुनः नामांकन 1983 में हुआ था — और तब नागरिकता हासिल हो चुकी थी — तो उस अवधि में नामांकन वैध हो सकता है। याचिका करने वालों को यह साबित करना होगा कि 1980 में नामांकित किया जाना गलत था।
राजनीतिक-सामाजिक पृष्ठभूमि और संवेदनशीलता
यह विवाद सिर्फ एक व्यक्तिगत मामला नहीं है — बल्कि यह देश में मतदाता सूची, नागरिकता, चुनावी वैधता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा है।
- इस विवाद को उठाने वालों में एक मुख्य नाम Amit Malviya का है, जो आरोप लगा चुके हैं कि 1980 में मतदाता सूची में नाम जोड़ना “स्पष्ट कानून उल्लंघन” था। उन्होंने कहा है कि 1980 में नाम जोड़ा गया, 1982 में हटाया गया, और 1983 में दोबारा जोड़ा गया — यह पूरी व्यवस्था संदिग्ध है।
- दूसरी ओर, विरोधी दल — मुख्य रूप से Indian National Congress (Congress) — ने इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप करार दिया है।
- मामला उस समय आया है जब पूरे देश में मतदाता-पंजीकरण (electoral roll), वोटर आईडी, नागरिकता और चुनाव सुधार पर बहस हो रही है — इसलिए यह विवाद और भी संवेदनशील बन गया है।
- अगर अदालत ने दावे स्वीकार कर लिए — कि अवैध नामांकन हुआ — तो यह सिर्फ Sonia Gandhi का मामला नहीं रहेगा; यह उन हजारों मतदाताओं, वोटर-लिस्ट प्रक्रियाओं, चुनाव आयोग की विश्वसनीयता, और भविष्य में वोटर पहचान पत्र / नागरिकता की जांच की प्रक्रिया पर असर डालेगा।
कानूनी व संवैधानिक आयाम — जो बात बनती है
- मतदाता सूची में नामांकन केवल भारतीय नागरिकों के लिए — यह नियम है। Representation of the People Act, 1950 में स्पष्ट बात है कि मतदाता वही हो सकते हैं जो नागरिक हों।
- यदि किसी गैर-नागरिक का नाम मतदाता सूची में जोड़ा गया — तो यह कानूनन अस्वीकार्य है; और यदि यह जानबूझकर हुआ — तो धोखाधड़ी (cheating), forging public records, electoral fraud आदि अपराधों के दायरे में आ सकता है।
- याचिकाकर्ता का जो दावा है — नामांकन 1980 में हुआ, नागरिकता 1983 में — यदि साबित हुआ, तो यह एक संवैधानिक-कानूनी उल्लंघन होगा, और यह दिखाएगा कि मतदाता सूची बनाने वालों या संबंधित अधिकारियों द्वारा नियमों की अवहेलना हुई थी।
- लेकिन, साबित करना मुश्किल हो सकता है: 1980 और 1983 के बीच करीब 45 साल हो चुके हैं; उस समय की मतदाता सूची, दस्तावेज, रजिस्टर, फॉर्म-8/फॉर्म-6/फार्म-8 (जो नामांकन/नाम-हटाने/नाम-फिर से जोड़ने के लिए इस्तेमाल होते थे) — सब खोज पाना मुश्किल होगा।
संभावित निहितार्थ एवं भविष्य
यह विवाद — यदि बड़े स्तर पर स्वीकार हुआ — तो केवल एक व्यक्ति या राजनीतिक परिवार के लिए नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, चुनावी व्यवस्था और मतदाता-पहचान प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण संदेश हो सकता है।
- मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर असर: अगर यह साबित हुआ कि एक प्रमुख नाम — जो बाद में संसद, राज्यसभा आदि में रहा — अवैध नामांकन के आधार पर था, तो मतदाता-सूचियों की अविश्वसनीयता पर सवाल उठेगा। सरकार, चुनाव आयोग, और भविष्य में वोटर पंजीकरण की प्रक्रिया पर दबाव बढ़ेगा, ताकि हर नाम वैध, नागरिकता-सत्यापित हो।
- नागरिकता और मतदाता-पहचान दस्तावेजों की सख्ती: यह मामला दिखाता है कि नागरिकता और वोटर-ट्रैकिंग (voter tracking) में पारदर्शिता, रिकॉर्ड-कीपिंग और दस्तावेजीकरण कितना महत्वपूर्ण है। भविष्य में नए नियम, संशोधन, या कड़े सत्यापन की मांग हो सकती है।
- राजनीतिक विवाद और चुनाव सुधार बहस: यह विवाद राजनीतिक रूप से संवेदनशील है — विपक्ष द्वारा आरोप–प्रत्यारोप और प्रामाणिकता की मांगें बढ़ेंगी; साथ ही चुनाव सुधार (electoral reform) पर बहस तगड़ी होगी।
- कानूनी वरीयता और न्यायपालिका की भूमिका: अदालतों को यह तय करना होगा कि मतदाता सूची में पहले नामांकन, बाद में नाम हटाना, फिर नाम दोबारा जोड़ना — क्या यह चुनाव आयोग की प्रक्रिया थी, या अवैधता; और क्या इसे फर्जीवाड़ा माना जाएगा। न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।
- सार्वजनिक विश्वास: यदि मामला न्यायसंगत तरीके से निपटा — यानी पारदर्शी जांच, निष्पक्ष सुनवाई — तो इससे मतदाता और आम जनता के बीच लोकतंत्र व चुनावों में विश्वास बना रह सकता है; लेकिन अगर पक्षपात, राजनीतिक दाया-देया, या ध्रुवीकरण हुआ — तो यह जनता के विश्वास को हानि पहुँचा सकता है।
आलोचनाएँ, संदेह व चुनौतियाँ
हालाँकि याचिकाकर्ता की दलीलें — नागरिकता-पहले मतदाता सूची, पुनः नामांकन, फर्जी दस्तावेज़ — गंभीर हैं, लेकिन इन्हें प्रमाणित करना आसान नहीं होगा। इसके कुछ प्रमुख कारण हैं:
- समय की दूरी: 1980 से अब तक 45 साल से अधिक हो चुके हैं। उस समय की मतदाता सूची, फाइलें, हस्तलिखित रजिस्टर, फॉर्म आदि — खो जाने, नष्ट होने, या अस्त-व्यस्त होने की संभावना है।
- दस्तावेजों की प्रामाणिकता: जो दस्तावेज Alleged electoral roll extract ( अर्थात् 1980 की लिस्ट का फोटो/scan) सार्वजनिक हुआ है — उसकी प्रमाणिकता, सत्य-निगम, आधिकारिकता (official seal, serial numbers, polling station डेटा आदि) पर सवाल उठाये जा सकते हैं।
- नाम हटाने व पुनः जोड़ने का कारण: अदालत ने पहले कहा था कि केवल नाम हटाना और पुनः जोड़ना यह साबित नहीं करता कि पहला नामांकन अवैध था — यह एक याचिका का मामला है, लेकिन हर कदम की जांच आवश्यक है।
- नेताओं की तीव्र राजनीतिक प्रतिक्रिया: जब किसी प्रमुख राजनेता पर आरोप लगते हैं, तो राजनीतिक भावना, पक्षपात, आरोप–प्रत्यारोप, मीडिया हाइप, सामाजिक मीडिया पर अफवाहें — सब संभावित रूप से मामले को प्रभावित कर सकते हैं। इससे सच्चाई खोजना और न्याय दिलाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
- संवैधानिक प्राधिकारियों की भूमिका: चुनाव संबंधी मामलों में अदालतों की सीमित भूमिका हो सकती है; कई बार, चुनाव आयोग या अन्य संवैधानिक संस्थाएं ही निर्णय व सत्यापन करें।

निष्कर्ष — स्थिति अब कहाँ तक है
- फिलहाल, यह कहना कि Sonia Gandhi “गलत तरीके से मतदाता सूची में थी” — यह स्थापित नहीं हुआ है। अदालत ने पहली याचिका खारिज की थी।
- लेकिन, रिवीजन याचिका स्वीकार हो चुकी है; कोर्ट ने नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई 6 जनवरी 2026 तय की गई है; साथ ही पुलिस और पक्षों से जवाब मांगा गया है।
- यह मामला अब केवल Sonia Gandhi पर नहीं — बल्कि उस पूरे नियामक ढाँचे, मतदाता-पंजीकरण प्रक्रिया, नागरिकता-प्रमाणन, चुनावी पहचान, और लोकतंत्र की विश्वसनीयता (credibility) पर नए सवाल खड़े कर गया है।
- भविष्य में, यदि अदालत या जांच एजेंसियां पुरानी मतदाता-लिस्ट, फॉर्म, दस्तावेज व रिकॉर्ड खंगाल सकें — और यदि असल में फर्जीवाड़ा हुआ हो — तो यह केवल एक व्यक्तिगत आरोप नहीं रहेगा; यह चुनावी सुधार, मतदाता-वेरिफिकेशन, और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की आयामों में एक महत्वपूर्ण मुँह दिखाने वाला मोड़ हो सकता है।
- दूसरी ओर, यदि मामला साबित न हुआ — या दस्तावेजों की कमी, रिकॉर्ड न मिलना, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, पक्षपात आदि के कारण निष्पक्ष निर्णय न हो — तो इससे चुनावी विवाद, ध्रुवीकरण और जनता के बीच अविश्वास की स्थिति बन सकती है।
पाँच मुख्य बातें — जिन्हें समझना चाहिए
- मतदाता सूची में नामांकन सिर्फ नागरिकों के लिए — यह संविधान व चुनाव कानून की मूल बातें हैं; यदि कोई गैर-नागरिक नामांकन करता है, तो वह कानूनन अवैध है।
- पुराने रिकॉर्ड व दस्तावेजों की प्रामाणिकता जाँचना मुश्किल — 1980 के मतदाता रोल, रजिस्टर, फॉर्म आदि अब 45 साल पुराने हो चुके — उनका मिलना, सुरक्षित रहना, प्रमाणिक होना भरोसे का सवाल है।
- नाम हटाना और पुनः जोड़ना — संदेह का विषय — केवल नाम की डिलीशन और पुनः नामांकन से यह तय नहीं होता कि पहला नामांकन अवैध था; कारण, प्रक्रिया, एवं दस्तावेज देखना जरूरी है।
- न्यायालय और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका महत्वपूर्ण — इस तरह के मामलों में अदालत, चुनाव आयोग, पुलिस — सबकी भूमिका अहम होती है; निष्पक्ष, पारदर्शी और नियमबद्ध जांच ज़रूरी है।
- यह मामला केवल एक व्यक्ति या परिवार का नहीं — पूरे सिस्टम का हो सकता है — यदि साबित हुआ कि एक प्रमुख नाम फर्जी तरीके से जोड़ा गया, तो यह जनता के विश्वास, चुनावी प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता, और भविष्य में वोटर-वेरिफिकेशन पर असर डालेगा।
आगे क्या देखने योग्य है
- 6 जनवरी 2026 को अगली सुनवाई — कोर्ट द्वारा मामले के रिकॉर्ड (TCR) की समीक्षा, दस्तावेजों की मांग, और जवाबी पक्ष (Sonia Gandhi व दिल्ली पुलिस) द्वारा जवाब दाखिल करना।
- यदि कोर्ट मई – जून 2026 तक जांच आदेश देती है — तो Election Commission, पुलिस या अन्य एजेंसियाँ संभावित जाँच शुरू कर सकती हैं।
- मीडिया, राजनीतिक दलों, आम जनता और नागरिक समाज की प्रतिक्रिया — जो लोकतंत्र, चुनाव सुधार, वोटर-वेरिफिकेशन के लिए नए संकेत दे सकती है।
- आगामी चुनावों — लोकसभा, विधानसभा, स्थानीय — में मतदाता-सूचियों, नामांकन प्रक्रियाओं, नागरिकता/पहचान प्रमाणपत्रों की समीक्षा — हो सकती है।
- दीर्घकालीन: भारत में मतदाता-पहचान, नागरिकता, व मतदान की प्रक्रिया में सुधार, पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने की दिशा में नए कदम उठाए जा सकते हैं।